श्रीराम जन्मोत्सव की कथा सुन भाव विभोर हुए भक्त हमेशा अधर्म पर धर्म की विजय के लिए भगवान ने लिया अवतार- अमरेश्वरा नंद

श्रीराम जन्मोत्सव की कथा सुन भाव विभोर हुए भक्त

हमेशा अधर्म पर धर्म की विजय के लिए भगवान ने लिया अवतार- अमरेश्वरा नंद

ब्यूरो चीफ आर एल पाण्डेय

लखनऊ। बीरबल साहनी मार्ग गोमती तट स्थित खाटू श्याम मंदिर प्रांगण में चल रहे रामार्चन महायज्ञ एवं श्री राम कथा में चौथे दिन सोमवार को कथा वाचक अमरेश्वरा नंद जी महाराज ने पंडाल में मौजूद भक्तों को श्री जन्म की कथा सुनाने के साथ सुंदर झांकियों के साथ जन्मोत्सव मनाया।
कथा वाचक स्वामी अमरेश्वरा नंद की महाराज ने कथा के दौरान भक्तों को बताया कि मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम
भगवान विष्णु का सातवां अवतार माने जाने वाले प्रभु श्री राम ने हमेशा अधर्म पर धर्म की विजय हेतु अवतार धारण किया है। टीवी पर तो हम सभी ने रामायण देखी होगी लेकिन फिर भी कई ऐसे प्रसंग रह जाते हैं जिनके बारे में लोगों को जानकारी नहीं होती है। कुछ ऐसी ही प्रभु श्री राम की जन्म कथा है। उन्होंने कहा कि हम आपको श्री राम की जन्म कथा के कुछ उन पहलुओं के बारे में बताएंगे ।
उन्होंने कहा कि महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। महाराज दशरथ ने श्यामकर्ण घोड़े को चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वाने का आदेश दिया। महाराज ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को बुलावा भेजा। वो चाहते थे कि सभी यज्ञ में शामिल हों। यज्ञ का समय आने पर महाराज दशरख सभी अभ्यागतों और अपने गुरु वशिष्ठ जी समेतअपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि के साथ यज्ञ मण्डप में पधारे। फिर विधिवत यज्ञ शुभारंभ किया गया। यज्ञ की समाप्ति के बाद समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट दी गई हैं और उन्हें सादर विदा किया गया। यज्ञ के प्रसाद में बनी खीर को राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों को दी। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों गर्भवती हो गईं। सबसे पहले महाराज दशरश की बड़ी रानी कौशल्या ने एक शिशु को जन्म दिया जो बेहद ही कान्तिवान, नील वर्ण और तेजोमय था। इस शिशु का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इस समय पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजित थे। साथ ही कर्क लग्न का उदय हुआ था। फिर शुभ नक्षत्रों में कैकेयी और सुमित्रा ने भी अपने-अपने पुत्रों को जन्म दिया। कैकेयी का एक और सुमित्रा के दोनों पुत्र बेहद तेजस्वी थे।

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