6 मई – श्रीरामचरितमानस की भाव सहित चौपाई
नमो राघवाय 🙏
भरद्वाज सुनु जाहि जब
होइ बिधाता बाम ।
धूरि मेरुसम जनक जम
ताहि ब्यालसम दाम ।।
( बालकांड, दो. 175)
राम राम 🙏🙏
प्रताभानु राजा के नष्ट होने की कथा सुनाने के बाद याज्ञवल्क्य जी भरतद्वाज मुनि से कहते हैं कि भरद्वाज जी सुनिए! विधाता जिसके भी प्रतिकूल होता है उसके लिए धूल सुमेरु पर्वत के समान, पिता काल समान व रस्सी साँप के समान काटने वाली हो जाती है ।
विधाता की प्रतिकूलता जीवन में हर पग पर दुख देती है वही उसकी अनुकूलता जीवन को सुखों से भर देती है । परंतु विधाता की अनुकूलता तो परहित , सेवा व सुमिरन से मिलती है । अत: परहित में लगें,विधाता का सुमिरन करें । अस्तु! राम राम, जय राम राम 🚩🚩🚩
5 मई – श्रीरामचरितमानस,
नमो राघवाय 🙏
कंद मूल फल सुरस अति
दिए राम कहुँ आनि ।
प्रेम सहित प्रभु खाए
बारंबार बखानि ।।
( अरण्यकांड, दो. 34)
राम राम 🙏🙏
सीता जी को खोजते हुए राम जी शबरी जी के आश्रम पहुँचे हैं । शबरी जी ने उनका चरण पखारकर आसन दिया है और फिर रसीले कन्द , मूल व फल लाकर राम जी को दिया है जिसे राम जी ने बार बार प्रशंसा करके प्रेम से खाया है ।
शबरी जी ने राम जी को जो कुछ दिया है राम जी ने उसे प्रेम से स्वीकार किया है । परंतु राम जी ने जो कुछ हमें दिया है उससे हम कभी भी संतुष्ट नहीं होते हैं बस उनसे माँगते ही रहते हैं । अस्तु! जो कुछ राम जी ने हमें दिया है उसी में मस्त रहें व राम राम करते रहें । अथ ! राम राम जय राम राम 🚩🚩🚩
संकलन तरूण जी लखनऊ

