दरअसल, उत्तर प्रदेश की राजनीति और सियासी गलियारों में चल रही साजिशों के बारे में जानना हो तो आपको पुराने मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में पीछे जाना होगा। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले बड़े पत्रकारों की पहुंच मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर सीएम तक आसान रहती थी। पुराने मुख्यमंत्री भी इन तथाकथित बड़े पत्रकारों को ओबलाइज करते हुए किसी को फ्लैट दिला देते थे, किसी के चहेते को खनन में हिस्सेदारी दिला दिया करते थे। किसी को अन्य तरीके से लाभांवित कर दिया करते थे।
यूपी तथा दिल्ली के लाभार्थी पत्रकारों की लखनऊ में लंबी लिस्ट है। कई लाभार्थी पत्रकार आज भी पुराने मुख्यमंत्रियों से सब्सिडी पर जमीन पाने और मकान बनाने के बाद सरकारी बंगलों में जमे हुए हैं। कुछ लोग सीएम को उनके जन्मदिन पर केक तक खिला देते थे, लेकिन योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद इस परिपाटी पर रोक लग गई। उनसे लाभ मिलना तो दूर वरिष्ठ पत्रकार उनके जन्मदिन पर केक खिलाने तक को तरस गये। सरकार और वरिष्ठ पत्रकारों के बीच पुरानी सरकारों में लेन-देन की जो म्यूचूअल अंडरस्टैंडिंग होती थी, योगी ने उसे ही खत्म कर दिया।
योगी आदित्यनाथ सियासी गलियारे में किसी के लिये लाभदायक नहीं हैं। वह उत्तर प्रदेश के बीमार लोगों के इलाज पर तो अरबों खर्च कर सकते हैं, लेकिन किसी पत्रकार को खनन का टेंडर दिलाने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। और यही बुराई योगी की कुर्सी हर बार छीन लिये जाने का सबसे बड़ा कारण है।
योगी कोई बहुत पॉलिटिकल नेता नहीं हैं, इसलिये वह चासनी में लपेट कर या बहुत घुमा फिराकर बात कहने की बजाय बिना लाग लपेट सीधा कह देते हैं। यह उन्हें तथा उनकी छवि को धक्का पहुंचाता है। योगी से केवल पत्रकार ही नहीं, विधायक और मंत्री भी नाराज हैं। विधायक इसलिये नाराज नहीं हैं कि उन्होंने जनता की सुविधा के लिये सड़क बनाने को कही थी और वह नहीं बनी, बल्कि इसलिये नाराज हैं कि अपनी सरकार होने के बाद भी वह अपनी पसंद का डीएम, एसपी, एसडीएम, सीडीओ, तहसीदार या थानेदार पोस्ट नहीं करा पाये, जबकि पुरानी सरकारों में विधायक इन कामों के अलावा टेंडर और ठेके तक मैनेज करा देते थे।
इस सरकार में कमीशन लेने तक में दिक्कत उठानी पड़ी। किसी मंत्री के पास चले जाइये, वो जनता का सही काम करने की बजाय भी सारा दोष योगी पर थोपकर गंगा नहा लेता है। अपने भाई को दलिद्दर सवर्ण कोटा (ईडब्ल्यूएस) से असिस्टेंट प्रोफेसर बनवा देने वाले सतीश द्विवेदी भी बेसिक शिक्षा विभाग में काम लेकर जाने वालों को बताया करते थे कि योगी ने हाथ-पैर बांध दिये हैं, एक भी तबादला संभव नहीं है, लेकिन खुद की और पत्नी का तबादला संभव कर लिया। भाई को सुदामा कोटा से असिस्टेंट प्रोफेसर बनवाने में योगी ने हाथ-पैर खुला छोड़ दिया। करोड़ों की जमीन लाखों में लिखवाने में भी योगी आड़े नहीं आये।
दरअसल, योगी की कड़ाई की आड़ लेकर उनके मंत्रियों और विधायकों ने अपनी आर्थिक स्थिति में तो सुधार किया, लेकिन जब जनता की सेवा करने या उनकी समस्या का समाधान करने की बात आई तो सारा ठीकरा योगी पर फोड़ दिया और ऐसा माहौल तैयार किया कि योगी कुछ करने नहीं दे रहे हैं। इन सबके इतर एक बात और भी सत्य है यानी यूनिवर्सल ट्रूथ की योगी का नौकरशाही के प्रति अंधविश्वास उन्हें आज नही तो कल सबक जरूर सिखाएगा । क्योंकि इस अंधविश्वास में आम आवाम की आवाज और पीड़ा आज उनके मुख से निकल नही पा रही है और कभी निकल भी जाये तो उसकी गूंज योगी तक पहुंच नही पा रही है ।
कोरोना काल का सारा ठीकड़ा योगी के सिर पर फोड़ा जा रहा है लेकिन कोई यह नही कह रहा कि लूटेरे अस्पताल के चाधडमोद डॉक्टरों ने दो लाठी दूर से ही मरीजो के इलाज का कोरम पूरा कर अस्पताल संचालक की झोलियां भरते रहे और मानवता को शर्मशार किया ।
इंसान बिना मुहूर्त के पैदा होता है और बिना मुहूर्त के मर भी जाता है फिर भी
सारी जिंदगी शुभ मुहूर्त के पीछे भागता रहता है, इसे कहते हैं अंधविश्वास की पराकाष्ठा । फिर भी यह अंधविश्वास और ढकोसला ऐसा है जिसके बगैर हम अधूरे है ।
इन मामलों में प्रेस के आजादी की तो बात ही मत कीजिये क्योंकि ‘प्रेस की आजादी इसमें नहीं है कि जो चीज हम चाहें, वही छप जाय। प्रेस की आजादी इसमें है कि हम उन चीजों को भी छपने दें, जिन्हें हम देखना और सुनना भी पसंद नही करते ।
सत्येन्द्र कुमार

