क्या लिखूं मैं,। विवेकानंद की धार्मिक जवानी लिखूं,। लक्ष्मीबाई के वीरता की कहानी लिखूं ,।
शिवाजी के साहस की रवानी लिखूं,
पूर्वजों के प्रेम की निशानी लिखूं, या आजकल की विखंडता का पानी पानी लिखूं,
जो डगर दे गए !उस पर चल न सके,
त्याग के रंगत में ढल न सके,
अपनेपन की दुनिया बसा न सके, बढ़ती चिंताओं को हम घटा न सके,
चोंचलो को रास्ते से हटा न सके, हँसी की सभा हम लगा न सके, कुविचारों को मन से मिटा न सके,
कोई नई राह! हम गढ़ न सके, पुरानी पर सीधे चलना सके,
ऊंची उड़ान हम भरते रहे,
आपसी द्वंद हम करते रहे,
आ गिरे दलदल के इस जाल में ,
न संयम रहा सुख के ख्याल में, शास्त्रों की बातों को दगा दे रहे, पूर्वजों की मनसा को ठगा कर रहे,
अब डूबे हैं हम इस मलाल में, कैसे सुरक्षित रहें! इस कोरोना काल में ।।
कवयित्री_कुमकुम मिश्रा
ग्रामकिनकी, पोस्ट सिसवरिया, जिला_गोंडा

