पर्यटन विभाग ने बदल दी धर्मनगरी अयोध्या स्थित मणिपर्वत की पौराणिकता

अयोध्या।धर्मनगरी अयोध्या की पौराणिकता का गवाह मणिपर्वत जर्जर अवस्था में तो है ही, अब इस पौराणिक धरोहर को लेकर भक्तों को दी जा रही जानकारी पर भी सवाल उठने लगे हैं।मणिपर्वत के बारे में जानकारी देने के लिए यहां लगाए गये बोर्ड पर संतों ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि बोर्ड पर जो जानकारी लिखी है उसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता है।सूत्र के मुताबिक रामविवाह के बाद जनकपुर से आई मणियों से जो पहाड़ बना था उसे ही मणिपर्वत (रत्नांचल) कहा जाता है। जबकि यहां लगे पर्यटन विभाग के बोर्ड में लिखा है कि हनुमान जी ने संजीवनी बूटी के पर्वत खंड को रखकर यहां विश्राम किया था।एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा द्वारा अयोध्या की पौराणिकता के गवाह 148 स्थानों को 1902 में चिह्नित कर उस पर पत्थर लगाए गए थे, ताकि इन धरोहरों को संरक्षित किया जा सके। इन्हीं में से एक मणिपर्वत का भी है।मणिपर्वत त्रेतायुगीन माना जाता है। मणिपर्वत के प्रधान पुजारी रामचरन दास बताते हैं कि मणिपर्वत पुरात्तव विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक है। यह पहले से ही जर्जर अवस्था में है और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जूझ रहा है।अब पर्यटन विभाग द्वारा मणिपर्वत को लेकर गलत जानकारी भी अयोध्या आने वाले भक्तों को दी जा रही है। कहा कि पयर्टन विभाग ने जो बोर्ड लगा रखा है उसमें जिक्र है कि संजीवनी बूटी ले जाते समय हनुमान जी ने इसी स्थल पर विश्राम किया था।इस कहानी की कोई मान्यता नहीं है। मणिपर्वत का जो इतिहास रूद्रयामल व सत्योपाख्यान में बताया गया है उसके तहत जब राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुहन चारों भाई शादी करने गए जनकपुर गए तो कैकेई ने एक कनक भवन बनवाने का हठ किया।महाराज दशरथ ने विश्वकर्मा को बुलवाकर बहुत ही कम समय में बहुत ही सुंदर कनक भवन बनवा दिया। महारानी कैकेई ने यह महल जानकी जी को उपहार में दे दिया साथ ही इंद्राणि से मिली मणि भगवान राम को दे दी।बाद में भगवान राम ने इस मणि को भरत जी को, फिर भरत जी ने लक्ष्मण को और लक्ष्मण ने शत्रुहन को दे दी। शत्रुहन ने सोचा कि जब बड़े भाईयों ने इस मणि को धारण नहीं किया तो मैं कैसे करूं, उन्होंने जानकी जी के चरणों में वह मणि अर्पित कर दी।यह बात सामने आई कि मणि का जोड़ा न होने के कारण राम इसे नहीं पहन रहे हैं। कैकेई ने वह मणि दिखाते हुए दशरथ से कहा कि जनक ने हमारे चारों पुत्रों का जोड़ा लगा दिया, इसलिए इस मणि का भी जोड़ा लगा दीजिए।
बाद में जानकी जी के आशीर्वाद से जनकपुर में मणियों का अंबार लग गया। जनकजी ने इसे पुत्री का धन मानते हुए अयोध्या भेज दिया। अयोध्या के रामकोट के दक्षिण दिशा में यह मणियां रख दी गईं जिसका महल बन गया जो एक योजन ऊंचा पहाड़ बन गया।यहीं मणिपर्वत की वास्तविक पौराणिकता है, इस बोर्ड को हटाया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि मणिपर्वत से ही हर वर्ष एक पखवाड़े तक चलने वाले झूलनोत्सव का श्रीगणेश होता है।रामकथा मर्मज्ञ पंडित कौशल्यानंदन वर्धन कहते हैं कि अयोध्या के जो भी पौराणिक स्थल हैं, उनके बारे में बिना शास्त्रोक्त प्रमाण के न जानकारी दी जाए।
उनका दावा है कि मणिपर्वत को लेकर पर्यटन विभाग ने अपने बोर्ड में हनुमान जी का संजीवनी बूटी लाते समय यहां विश्राम करने का जिक्र किया गया है, इसका कहीं भी कोई उल्लेख नहीं है।
जनकपुर से लाई गई मणियों से मणिपर्वत का निर्माण हुआ था, इसका जिक्र रूद्रयामल व सात्योपाख्यान रामायण मे है। जनश्रुति में यह भी कहा जाता है कि जब भरत ने हनुमान जी को बाण मारा था तो संजीवनी का एक टुकड़ा यहां गिर गया था।
जो मणियों का पहाड़ बन गया, हालांकि अयोध्या में इस जनश्रुति की कोई मान्यता नहीं है। इसका कहीं किसी ग्रंथ में जिक्र नहीं है, इसलिए इस बोर्ड को तत्काल हटाया जाना चाहिए।जगतगुरु रत्नेश प्रपन्नाचार्य कहते हैं कि पयर्टन विभाग द्वारा जो जानकारी दी जा रही है, वह आधार विहीन है। सत्योपाख्यान ग्रंथ में जनकपुर से आई मणियों से मणिपर्वत की स्थापना का जिक्र मिलता है।
साथ ही मणिपर्वत के बगल ही तिलोदकी गंगा भी प्रवाहित हैं इसका भी जिक्र है। रामनगरी के संतों व मंदिरों में भी जनकपुर की ही कहानी की मान्यता है। हनुमान जी का संजीवनी बूटी लाते समय यहां विश्राम करने का जिक्र कहीं नहीं मिलता।जो इस तरह के जानकारी दे रहे हैं, उन्हें इसका आधार प्रस्तुत करना चाहिए। पर्यटन विभाग को तत्काल इस बोर्ड पर मणिपर्वत की सही कथा का अंकन कराना चाहिए।वही अपर जिलाधिकारी नगर वैभव शर्मा का मानना है कि पयर्टन विभाग की ओर से जो बोर्ड मणिपर्वत के पास लगाया गया है, उसकी जानकारी कराएंगे। उस पर मणिपर्वत को लेकर क्या अंकित है, इसको देखा जाएगा। यदि संतों को इस बोर्ड पर आपत्ति है और इसमें गलत जानकारी दी जा रही है तो इसे सही कराया जाएगा।

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