*धर्म, प्रशासन और राष्ट्र सेवा: कुंभ प्रबंधन की चुनौतियां*
भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना में ‘संगम स्नान’ का महत्व सर्वोपरि है। लेकिन जब आस्था का यह सैलाब धरातल पर उतरता है, तो इसकी सुरक्षा और संचालन की जिम्मेदारी प्रशासन के कंधों पर होती है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल स्नान करना ही धर्म है, या व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करना भी एक प्रकार की राष्ट्र सेवा और धर्म है?
*मेला संचालन: एक कठिन राजधर्म*
प्राचीन काल में राजाओं का कर्तव्य होता था कि वे तीर्थयात्रियों की रक्षा करें। आज के समय में यही उत्तरदायित्व प्रशासन निभाता है। यदि संगम स्नान धर्म है, तो उस स्नान को निर्विघ्न संपन्न कराना ‘प्रशासनिक धर्म’ है।
भीड़ प्रबंधन (Crowd Management) कोई साधारण कार्य नहीं है। एक छोटी सी अफवाह या एक गलत मोड़ पर बढ़ती भीड़ ‘भगदड़’ का रूप ले सकती है, जिसमें हजारों निर्दोषों की जान जा सकती है। जब प्रशासन बैरिकेडिंग करता है या मार्ग परिवर्तित करता है, तो उसका उद्देश्य किसी की आस्था को रोकना नहीं, बल्कि ‘जीवन की रक्षा’ करना होता है। शास्त्रों में भी कहा गया है— ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात धर्म के सभी साधनों के लिए शरीर (जीवन) का सुरक्षित होना पहली शर्त है।
*शंकराचार्य और नेतृत्व की भूमिका*
शंकराचार्य हिंदू धर्म के सर्वोच्च मार्गदर्शक माने जाते हैं। समाज उन्हें आदर्श मानता है। ऐसे में जब प्रशासन सुरक्षा कारणों या वीआईपी प्रोटोकॉल के तहत किसी मार्ग को प्रतिबंधित करता है, तो आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा उसका पालन किया जाना एक बड़ा संदेश देता है।
अनुकरण का प्रभाव: यदि एक धर्माचार्य प्रशासन की बात मानकर धैर्य का परिचय देते हैं, तो उनके लाखों अनुयायी भी अनुशासन का पालन करते हैं।
राष्ट्र सेवा के रूप में अनुशासन: जैसा कि हमने पहले ही कहा, प्रशासन की बात मान लेना भी राष्ट्र सेवा है। किसी भी आपदा की स्थिति में सबसे पहले दोष प्रशासन पर ही मढ़ा जाता है, जबकि अव्यवस्था अक्सर नियमों के उल्लंघन से शुरू होती है।
*प्रशासन: सरकार का नहीं, जनता का प्रहरी*
यह समझना आवश्यक है कि मेला क्षेत्र में तैनात पुलिसकर्मी या अधिकारी किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि वहां मौजूद हर एक नागरिक की सुरक्षा के लिए खड़े होते हैं।
अदृश्य सुरक्षा चक्र: घंटों पानी में खड़े रहकर ड्यूटी करना, रात भर गश्त लगाना और लाखों लोगों को दिशा दिखाना एक कठिन तपस्या है।
उत्तरदायित्व: यदि कोई अनहोनी हो जाए, तो जवाबदेही प्रशासन की होती है। इसलिए, जब वे किसी को (चाहे वो कितने भी प्रतिष्ठित क्यों न हों) रोकते हैं, तो वह व्यक्तिगत विरोध नहीं बल्कि सामूहिक सुरक्षा का हिस्सा होता है।
*आस्था और विज्ञान का संतुलन*
आज के समय में बड़े आयोजनों का प्रबंधन तकनीक और डेटा (जैसे ड्रोन निगरानी, एआई कैमरा) के आधार पर होता है। यदि भीड़ का घनत्व एक निश्चित स्तर से ऊपर चला जाए, तो प्रवेश रोकना अनिवार्य हो जाता है। ऐसे तकनीकी निर्णयों को धार्मिक चश्मे से देखना अनुचित है।
निष्कर्ष
धर्म हमें अनुशासन सिखाता है। संगम की पवित्रता केवल जल में डुबकी लगाने में नहीं, बल्कि इस विचार में भी है कि हमारे किसी कृत्य से किसी दूसरे के जीवन को संकट न पहुंचे। प्रशासन का सहयोग करना केवल एक नागरिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि यह ‘मानवता की सेवा’ है, जो किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से कम नहीं है। यदि श्रद्धालु और धर्मगुरु प्रशासन के साथ मिलकर चलें, तो ‘धर्म’ और ‘व्यवस्था’ दोनों की जीत होगी।
*रणधीर सिंह की डायरी*

