गीता प्रवचन स्वाध्याय का 77 वाँ सप्ताह आज नर्मदा जयंती के दिन सफलतापूर्वक सम्पन्न : अमित परमार

गीता प्रवचन स्वाध्याय का 77 वाँ सप्ताह आज नर्मदा जयंती के दिन सफलतापूर्वक सम्पन्न : अमित परमार

गीता प्रवचन स्वाध्याय का 77वाँ सप्ताह ऑनलाइन माध्यम से सम्पन्न हुआ। इस सत्र में विषय का प्रवेश सयोजक श्री अमित परमार द्वारा कराया गया जिसमें गीता के ज्ञान के लक्षण के सार को उदाहरणों द्वारा क्रमशः ब्रम्ह विद्या मंदिर से आदरणीय ज्योत्सना दीदी और स्वाध्याय परिवार से आदरणीय अलका प्रकाश पाण्डेय और दिलीप जगन्नाथ पवार जी द्वारा सुन्दर ढंग से रखा गया |

सर्वप्रथन कार्यक्रम का शुभारंभ ब्रम्ह विद्या मंदिर पवनार से आदरणीय ज्योत्सना बहन द्वारा मंगलाचरण के साथ किया गया और सभी को नर्मदा जयंती की शुभकामनाये दी गई| उन्होंने सभी को बताया कि श्रीमद्भगवद्गीता का तेरहवाँ अध्याय मे “क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग” आत्मतत्त्व के गूढ़ ज्ञान को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि शरीर को क्षेत्र और उसे जानने वाले चेतन तत्त्व को क्षेत्रज्ञ कहते हैं। जो मनुष्य क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्रकृति और पुरुष के सत्य संबंध को भली-भाँति समझ लेता है, वही मोक्ष को प्राप्त करता है और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होता है। उन्होने ईसा मसीह का उदाहरण देते हुए बताया कि परमेश्वर की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए। ज्ञान के लक्षण पर अपना मनन अनुभव करते हुए ज्ञानेश्वर जी ने अपनीज्ञानेश्वरी मे 700 ओवियों(छंद) लिखी है और उन ओवियोंमें अपना अनुभव उंडेल दिया है| चांगदेव और ज्ञानेश्वर जी से जुड़े रुचिकर कहानी और उस कोरा पत्र का जिक्र भी सभी ने ज्योत्सना दीदी से सुना कि ज्ञानदेव जी ने आगे चलकर अपने गुर और बड़े भाई निवृत्ति नाथ के कहने पर पत्र के जबाब मे चंगदेव पष्टी (चंगदेव-पत्रिका) की रचना की| संत परंपरा की यह एक प्रसिद्ध रचना है, जो संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा योगी चंगदेव को लिखे गए पत्र के रूप में मानी जाती है। यह रचना अहंकार-विसर्जन, आत्मबोध और सच्चे ज्ञान का संदेश देती है। चंगदेव अपनी योग-सिद्धियों और दीर्घ आयु के कारण प्रसिद्ध थे, किंतु उनमें सिद्धियों का अभिमान था। ज्ञानेश्वर महाराज ने इस पष्टी के माध्यम से स्पष्ट किया कि केवल योग-सिद्धियाँ आत्मज्ञान का प्रमाण नहीं होतीं; वास्तविक ज्ञान वही है जिसमें अहंकार का लय, विनम्रता और ब्रह्मानुभूति हो। इस रचना में गुरु-कृपा का महत्त्व, देह-आसक्ति का त्याग, और आत्मा-परमात्मा की एकता का बोध सरल, ओजस्वी और उपदेशात्मक भाषा में व्यक्त किया गया है। चंगदेव पष्टी संत साहित्य की अमूल्य निधि है, जो साधक को बाह्य चमत्कारों से हटाकर अंतर्मुखी साधना और आत्मसाक्षात्कार की ओर प्रेरित करती है।
स्वाध्याय समूह से अलका प्रकाश पांडेय ने बताया कि सत्य-असत्य का विवेक करके सत्यको ही सदा ग्रहण करना चाहिए। सार-असारका विचार करके सार ही लेना चाहिए। फेककर मोती ग्रहण करना है। इस प्रकार आत्म-प्रयत्न और परमेश्वरीय कृपाके जीवनका श्रीगणेश करना है। उन्होने उदाहरण के रूप मे ईसा मसीह ने अपने जीवन में सत्य और न्याय के लिए संघर्ष किया। उन्होंने लोगों को सत्य का मार्ग दिखाया और आत्म-प्रयत्न के साथ परमेश्वर की कृपा पर विश्वास करने के लिए प्रेरित किया। उनके जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि सत्य और न्याय के लिए लड़ना चाहिए और परमेश्वर की कृपा पर विश्वास रखना चाहिए।
स्वाध्याय समूह से दिलीप जगन्नाथ पवार जी ने बताया कि देह और आत्माका यह पृथक्करण तबतक शक्य नहीं है, जबतक सत्य-असत्यका विवेक न हो। यह विवेक, यह ज्ञान, हमारी रास-रंगमे व्यापक हो जाना चाहिए। ज्ञानका अर्थ हम करते है ‘जानना’। परन्तु बुद्दिसे जाना यह ज्ञान नहीं है। मुँहमें कौर डालना भोजन कर लेना नहीं है। मुँहमें डाला हुआ चबाकर गलेमें जाना चाहिए और वहाँसे पेटमें जाकर, पचकर उसका रस, रक्त सारे शरीरमें पहुँचकर पुष्टि मिलनी चाहिए। ऐसा होगा तभी सच्चा भोजन होगा। उसी तरह कोरे बुद्धिगत जानसे काम नहीं चल सकता। वह जानकारी, वह ज्ञान सारे जीवनमें व्याप्त होना चाहिए, हृदयमें संचरित होना चाहिए।
गीता के इन बीस साधनो की ज्ञानदेवने अठारह ही कर दिया है। इनेका वर्णन बड़ी हार्दिकतासे किया है। इन गुणोंसे संबंध रखवाले केवल पांच ही श्लोक भगवद्गीतामें है, परन्तु ज्ञानदेवने अपनी परमेश्वरमे इनपर सात सौ सत्तावन ओवियाँ (छंद) लिखीं। इस बातके लिए बड़ी चितित है कि समाजमें सद्गुणोंका विकास हो, सत्यस्वरूप परमेश्वरकी महिमा फैले। इन गुणोंका वर्णन करते हुए उन्होंने अपना मनन अनुभव उन ओवियोंमें उंडेल दिया। मराठी भाषाभियोपर उनका यह अनंत उपकार है। ज्ञानदेवके रोम-रोममे ये गुण व्याप्त थे।”

अमित परमार ने प्रोग्राम में जुड़े आदरणीय ज्योत्सना पटेल, पुष्प्रेंद्र जी, बिमलमुंडे जी,अनिल उपाध्याय जी, सीमा देशमुख, सत्रुधन झा, दीपिका उपाध्याय, दिलीप पवार, चतुरा रासकर, शिवम वाडा, डॉ. सुरेश गर्ग, हेमा ब्रह्मभट्ट, मनोज मीता पांडेय, क्रति (Krati) शाह, उषा शर्मा, संदीप कुमार वर्मा, करूनेश राव, मनीषा, प्रोफेसर देवराज सिंह, आदरणीय रमेश भैया जी, बिमला दीदी, कुसुम जी, नाथूराम भाई, कविता जी, अलका प्रकाश पाण्डेय जी , आदरणीय सुरेश गर्ग और मनोज मीता जी, शिवाकान्त जी, ओमप्रकाश जी, वर्षा शाह जी, उषा शर्मा आदि सहभागियों को स्वाध्याय परिवार मे नियमित जुडने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।

इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण गूगल मीट के लिंक से जुड़कर प्रत्येक रविवार शाम को 6:15 – 6:45 के बीच होता है। कार्यक्रम के अंत में आज आदरणीय सुरेश गर्ग जी विदिशा से जुड़े थे और बताया कि इस स्वाध्याय समूह से प्रेरणा लेते हुए आपने विदिशा मे हर माह हर धर्म को लेके दो घंटे का स्वाध्याय शुरू किया है पिछली बार जैनधर्म को लिया था और इस बार सिख धर्मको लिया है और उस धर्म के गुरु इसमे प्रतिभाग करते है और आप इसे सतत चलाने के लिए अग्रसर है|
कार्यक्रम का समापन आदरणीय रमेश भैया जी ने किया और बताया कि इसमे जुडने वाली विद्वजन लोगो को देखकर ही कार्यक्रम की सफलता प्रतीत होती है| ज्योत्सना दीदी के शब्दो और ज्ञान को बताने के लिए धन्यवाद ज्ञपित किया और अलका पाण्डेय तथा दिलीप पवार जी को सुंदर वक्तव्य के लिए धन्यवाद दिये और आगामी रविवार मे ब्रम्ह विद्या मंदिर से आदरणीय उषा दीदी पूरे 30 मिनट अध्याय 13 का सार रखते हुए समापन करेंगी ऐसा अग्रिम सूचना भी सभी साथियो को दिया जिससे वो इसका लाभ उठा सके|

साप्ताहिक स्वाध्याय में भाग लेने के लिए सुनने के लिए आप भी मोबाइल नंबर 9670511153 और ईमेल amitparmar47@gmail.com से जुड़ सकते है।

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