दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘प्राचीन भारतीय परम्पराओं में नैतिकता और मूल्य’ विषयक दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन*
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*जो समाज अपनी संस्कृति से कट जाता है, वह उस वृक्ष के समान है जिसकी कोई जड़ ही नहीं होती है।– प्रो निरंजन कुमार*
नई दिल्ली।
दिल्ली विश्वविद्यालय की मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम समिति द्वारा ‘प्राचीन भारतीय परम्पराओं में नैतिकता और मूल्य’ विषय पर दो दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यशाला (कैपिसिटी बिल्डिंग वर्कशॉप) का आयोजन किया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए आयोजित इस कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम समिति के अध्यक्ष प्रो. निरंजन कुमार ने प्रश्न उठाया कि आज रोबोटिक्स और AI के युग में हमें प्राचीन भारतीय संस्कृति पर बात करने की आवश्यकता क्यों है? उन्होंने कहा जो समाज अपनी संस्कृति से कट जाता है, वह उस वृक्ष के समान है जिसकी कोई जड़ ही नहीं होती है। हमारे देश में साजिशन हमारी संस्कृति को भुलाने का कार्य किया गया है। संस्कृति के खिलाफ कई प्रकार के नैरेटिव इतिहास की पुस्तकों के माध्यम से गढ़े गए। आज इतिहास की पुस्तकों को पुनः लिखे जाने की आवश्यकता है। हमें अपने वेद-उपनिषदों को आज और भी अधिक जानने की आवश्यकता है क्योंकि समाज में यह भ्रम है कि विभिन्न लोकतांत्रिक मूल्य तत्व यूरोप से आए हैं। कहा जाता है कि समानता स्वतंत्रता और बंधुत्व या लोकतंत्र इत्यादि मूल्य पश्चिम से हमारे यहाँ आए। जबकि सत्य तो यह है कि वेद पुराण, उपनिषद्, बौद्ध और जैन मत आदि में इनका सार स्पष्ट रूप से मौजूद है। आगे प्रो. कुमार ने देश के लिए भारत नाम पर जोर देते हुए कहा कि देर से ही सही लेकिन आज पुनः भारत अपनी अस्मिता को प्राप्त कर रहा है। नरेंद्र मोदी की वर्तमान सरकार के समय पहली बार हमने देखा है कि ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ या फिर ‘प्राइम मिनिस्टर ऑफ भारत’ का प्रयोग हो रहा है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दैनिक जागरण के कार्यकारी संपादक श्री विष्णु त्रिपाठी ने कहा कि नैतिकता और मूल्य भारतीय समाज के डीएनए में रहे हैं। हालाँकि प्रत्येक पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से अधिक तार्किक होती है, लेकिन यदि उसे सही दृष्टि प्रदान की जाए तो निश्चित रूप से वह उन नैतिक मूल्यों को और आगे लेकर जाएगी। नई पीढ़ी को यह दृष्टि प्रदान करने का कार्य हमारे शिक्षकों का है। उन्होंने कहा कि बहु-अनुशासनिकता हमारी ज्ञान परम्परा में मौजूद रही है. हमारे विद्वान एक साथ संस्कृत, खगोलशास्त्र, ज्योतिष, चिकित्सा में महारत रखते थे. यूरोप के पद्धति से अलग हमारे यहाँ ज्ञान खांचो में नहीं बंटा था। हमें अपनी प्राचीन परम्पराओं को अगली पीढ़ी तक लाना चाहिए। आजादी के बाद वाममार्ग या पश्चिमी प्रभाववश सत्ताधारी वर्ग ने कौटिल्य और पतंजलि जैसे दार्शिनिकों को पाठ्यक्रम में न पढ़ाकर अरस्तू और मार्क्स आदि लगाये गए।
कार्यक्रम के समापन सत्र के मुख्य अतिथि जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के महासचिव रंजन चौहान जी ने कश्मीर के शारदा पीठ का उदाहरण देते हुए कहा भारतीय संस्कृति में संवाद की प्राचीन परंपरा रही है। आदि शङ्कराचार्य जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे शारदा पीठ में पाँच आचार्यों से उनका प्रश्नोत्तर और शास्त्रार्थ हुआ था। पाँचों आचार्यों ने उनकी श्रेष्ठता स्वीकार की। इस परंपरा की आज बहुत ज़रूरत है।
प्रो हीरामन तिवारी, डॉ. बीरेन्द्र प्रसाद डॉ शोभना सिन्हा आदि ने तकनीकी सत्रों में अपना व्याख्यान दिया। प्रो. प्रभात मित्तल और प्रो. रजनी साहनी, डॉ अनन्या बरुआ आदि की आयोजन में प्रमुख भूमिका रही। यहाँ बता दें दिल्ली विश्वविद्यालय की मूल्य संवर्धन पाठ्क्रम समिति शिक्षकों के लिए इस तरह की कार्यशालाओं का आयोजन लगातार
करती रहती है।

