आस्था, राष्ट्रभाव और प्रकृति चेतना की काव्य-प्रतिध्वनि: स्मृति श्रीवास्तव का ‘अन्तर्ध्वनि’

आस्था, राष्ट्रभाव और प्रकृति चेतना की काव्य-प्रतिध्वनि: स्मृति श्रीवास्तव का ‘अन्तर्ध्वनि’

समीक्षक: उमेश कुमार सिंह

डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

“अन्तर्ध्वनि” शीर्षक अपने आप में दार्शनिक गहराई लिए हुए है। ध्वनि केवल श्रव्य तरंग नहीं, बल्कि चेतना की कंपनशील ऊर्जा है; और जब वही ध्वनि अंतःकरण में प्रतिध्वनित होती है, तो वह अंतर्ध्वनि बन जाती है। संग्रह की भूमिका में व्यक्त विचार—“सर्वे भवन्तु सुखिनः”—पूरे काव्य-संसार का नैतिक और आध्यात्मिक आधार निर्मित करता है। यह कृति किसी एक भाव-क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भक्ति, प्रकृति, राष्ट्रप्रेम, सामाजिक जागृति और अंतर्मन के सूक्ष्म द्वंद्व तक विस्तृत काव्य-परिसर रचती है।

संग्रह का आरंभ गणेश वंदना से होता है और माँ सरस्वती, नमामि शंकर तथा दुर्गा स्तुति के माध्यम से भारतीय अध्यात्म की सांस्कृतिक निरंतरता को स्थापित करता है। “जग में चहुँ दिश आनंद सरसे, सबके आँगन आशीष बरसे” जैसी पंक्तियाँ कवयित्री के सार्वभौमिक मंगलकामना भाव को उद्घाटित करती हैं। यहाँ भक्ति पलायन नहीं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है, जो व्यक्ति को करुणा और समभाव की ओर प्रेरित करती है।

“पर्व-पुष्पांजलि” खंड भारतीय उत्सव-परंपरा का काव्यात्मक अभिलेख है। नूतन वर्ष से लेकर मकर संक्रांति, रक्षाबंधन, हरतालिका तीज और शिक्षक दिवस तक, प्रत्येक पर्व को केवल अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है। मकर संक्रांति पर सूर्य को काव्य-अर्घ्य देते हुए कवयित्री भारतीय लोक-संस्कृति की विविधता में निहित एकता को रेखांकित करती हैं—पोंगल, बिहू, लोहड़ी जैसे विभिन्न नामों के बावजूद अंतर्ध्वनि एक ही है: सौहार्द और समरसता।

“मातृभूमि के गौरव” खंड राष्ट्रभाव की ओजस्वी अभिव्यक्ति है। स्वतंत्रता के प्रहरियों और शहीदों की शौर्यगाथाएँ केवल ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि नैतिक प्रेरणा का स्रोत हैं। कवयित्री भारतभूमि को ऋणस्वरूप स्वीकार करती हैं और संस्कृति के स्वर्णिम स्वर, सद्भाव तथा विश्वबंधुत्व की भावना को समकालीन परिप्रेक्ष्य में पुनर्स्थापित करती हैं। यहाँ राष्ट्रप्रेम उग्रता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और कृतज्ञता का भाव है।

प्रकृति-केंद्रित खंड “हरित धरा का आह्वान” संग्रह की विशिष्ट उपलब्धि है। “पृथ्वी को सांस लेने दो” और “पर्वत पुकार रहे हैं” जैसी कविताएँ पर्यावरणीय संकट पर संवेदनशील हस्तक्षेप हैं। कवयित्री धरती को एक नारी-रूपक में देखती हैं, जो अति-दोहन से व्यथित है। प्रकृति का यह मानवीकरण केवल अलंकारिक युक्ति नहीं, बल्कि पारिस्थितिक चेतना का काव्यात्मक प्रतिरोध है। गिरती पत्तियों की लय, रिमझिम बूंदों की मधुरिमा, शरद का आगमन और सितारों की रागिनी—इन सबके माध्यम से प्रकृति एक जीवंत संवादिनी बन जाती है।

“जागृति के स्वर” खंड में कवयित्री समकालीन सामाजिक यथार्थ से मुठभेड़ करती हैं। “लाइक और कमेंट की दुनिया” डिजिटल युग की आभासी संवेदनाओं पर सूक्ष्म व्यंग्य है, तो “रिवाज़ और परंपराएँ” तथा “पारंपरिक बनाम समकालीन” बदलते सामाजिक मूल्यों पर विमर्श प्रस्तुत करती हैं। “बेटियाँ” और “शक्ति स्वरूपा” स्त्री-सशक्तिकरण की सशक्त अभिव्यक्ति हैं, जहाँ नारी को करुणा और सामर्थ्य—दोनों का संगम माना गया है। बुजुर्गों की सीख, रिश्तों की जटिलता और सहानुभूति बनाम युद्ध जैसे विषयों के माध्यम से संग्रह सामाजिक नैतिकता की पुनर्समीक्षा करता है।

अंतिम खंड “अंतर्मन के दीप” संग्रह की भाव-गहराई का चरम है। यहाँ कविताएँ आत्मसंवाद बन जाती हैं—“अनकही प्रीति”, “मौन दस्तक”, “अंतर्मन का द्वंद्व” और “आत्म संतुष्टि” जैसे शीर्षक मनुष्य की भीतरी परतों को उद्घाटित करते हैं। जीवन की एकरसता, सपनों का संबल, स्मृतियों की ऊष्मा और समर्पण की निस्तब्धता—इन सबके बीच कवयित्री एक संतुलित जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करती हैं। भाषा सरल है, पर भाव-संरचना गहरी और बहुस्तरीय।

संपूर्ण संग्रह का काव्य-शिल्प सहजता और संप्रेषणीयता पर आधारित है। अलंकारों का संयमित प्रयोग, लयात्मक प्रवाह और भावात्मक प्रामाणिकता इसे पाठक के निकट ले आते हैं। स्मृति श्रीवास्तव की कविताएँ दुरूह बिंब-भाषा का आश्रय नहीं लेतीं; वे सीधे हृदय से संवाद करती हैं। यही कारण है कि उनका काव्य बौद्धिक विश्लेषण के साथ-साथ भावनात्मक स्पर्श भी प्रदान करता है।

“अन्तर्ध्वनि” केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि आत्मा और समाज के बीच सतत संवाद का सेतु है। यह कृति बताती है कि आध्यात्मिकता, राष्ट्रभाव, प्रकृति-प्रेम और सामाजिक चेतना परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही व्यापक मानवीय संवेदना के विविध आयाम हैं। स्मृति श्रीवास्तव की लेखनी पाठक को बाह्य कोलाहल से भीतर की शांति की ओर ले जाती है, जहाँ अंतःचेतना की सूक्ष्म ध्वनि सुनाई देती है।

यह कृति समकालीन हिंदी साहित्य में एक सार्थक और मूल्यपरक योगदान के रूप में रेखांकित की जा सकती है। “अन्तर्ध्वनि” न केवल पाठकीय संवेदना को जाग्रत करती है, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक आत्मावलोकन की प्रेरणा भी देती है। यह संग्रह इस विश्वास को पुष्ट करता है कि जब कविता अंतर्मन से उपजती है, तो उसकी ध्वनि समय की सीमाओं को पार कर स्थायी प्रभाव छोड़ती है।

पुस्तक : अन्तर्ध्वनि

लेखिका : स्मृति श्रीवास्तव

प्रकाशक: डायमंड पॉकेट बुक्स

समीक्षक: उमेश कुमार सिंह

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लेखिका : स्मृति श्रीवास्तव

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26 फरवरी विनायक सावरकर पुण्यतिथि पर विशेष-

सावरकर रहे विशुद्ध हिंदू राष्ट्रवाद के अनुयाई

– सुरेश सिंह बैस शाश्वत

विनायक दामोदर सावरकर तेजस्वी पुरुष थे। ओज और तेज से भरपूर और राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिये पूर्णरुपेण समर्पित, राष्ट्र की स्वतंत्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के बाद भी उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्र के हित में‌ ही बीता। विप्लवी सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को देवलाली के पास भंगुर ग्राम में हुआ। उनके पिता का नाम दामोदर पंत और माँ का राधादेवी था। सावरकर के और दो भाई गणेशपंत, नारायण राव भी थे। ये जाति से ब्राम्हण थे। दोनों भाई देश भक्ति में आगे ही आगे रहते। इसी कारण बड़े भाई गणेश पंत को विनायक के पहले से ही काले पानी की सजा हो गई थी। भंगुर ग्राम में प्रारंभिक शिक्षा के बाद वे उच्च शिक्षा के लिये नासिक गये।

सन् 1905 में सावरकर ने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1906 से उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरु की। आगे की पढ़ाई के लिये वे लंदन गये। कहने को तो ये बैरिस्ट्री की सनद लेने गये थे पर वास्तव में सावरकर विदेश में रहकर भारत की आजादी के लिये कार्य करने गये थे। वे 1906 में लंदन के ग्रेइन में दाखिला लिये। उन्होंने ग्रेइन की अंतिम परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। लेकिन ग्रेइन की संचालन समिति के बेंचरों ने उन्हें बार में बुलाने से इंकार कर दिया। सावरकर ने राष्ट्रवादी विचारों के लिये लंदन में ही “फ्री इंडिया सोसायटी” की स्थापना की। जिसके माध्यम से वे अभिनव भारत को अपनी परिकल्पना को साकार करने के लिये समान विचारों वाले युवको को एक मंच पर एकत्र करते थे। ब्रिटिश अधिकारियो को उनकी गतिविधियों की भनक लग गई थी तथा स्काटलैण्ड यार्ड के जासूस उन पर नजर रख रहे थे। ग्रेइन ब्रिटिश में कानून की पढ़ाई का सबसे पुराना अध्ययन केन्द्र था। उसके अलावा तीन अन्य केंद्र लिंकन्स इन, इनर टेपल, मिडिल टैपुल भी थे। वे चारों केंद्र कानूनी अध्ययन के प्रतिष्ठित केंद्रों में थे।

ब्रिटेन में परंपरानुसार प्रत्येक बैरिस्टर को इन चार में से किसी एक सोसायटी का सदस्य होना अनिवार्य हैं। ये सोसायटियां ही उत्तीर्ण छात्रों को वैरिस्टर की उपाधि प्रदान करती थीं। सावरकर ने जब कानून की अंतिम परीक्षा भी पास कर ली तब उन्हें उपाधि के लिये बार में नहीं बुलाया गया तो उन्होंने उच्च अधिकारियों के समक्ष इसकी शिकायत की। इस मामले में एक जांच कमेटी बनाई गई जिसके पास पहले से ही सावरकर के खिलाफ ब्रिटेन विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप पत्र था। जाँच में सावरकर के विरुद्ध कुछ भी साबित नहीं हो सकने के बावजूद कमेटी ने सावरकर के विरुद्ध ही निर्णय लेकर उन्हें उपाधि नहीं देने का अन्यायी निर्णय लिया। और सावरकर को कानून की पूरी पढ़ाई कर लेने के बाद भी वैरिस्टर के रुप में मान्यता नहीं दी गई। जाँच कमेटी ने उन्हें यह कहा कि वे यह लिखकर दें कि वे राजनीति में कभी भाग नही लेंगे तो उन्हें वैरिस्टर बनाने पर विचार किया जा सकता है। लेकिन सावरकर ने बेझिझक उनका वह प्रस्तात ठुकरा दिया।

सन् 1905 में इनका विवाह जवाहर के दीवान श्री चिपणुकर की पुत्री से हुआ था। प्रसिद्ध क्रांतिकारी कृष्ण शर्मा से संपर्क होने पर उनकी बैरिस्टर की पढ़ाई एवं क्रांतिकारी गतिविधिया दोनों साथ चलने लगी। सावरकर की राजनीतिक गतिविधियों पर गुप्तचर, विभाग की निगाहें शुरु से ही थी। अतएव उन्हें वैरिस्टी की पढ़ाई के बाद भारत आने से रोक दिया गया। उन पर राजद्रोह के आरोप लगाये गये। और उनकी गिरफ्तारी का वारंट इंग्लैंड भेजा गया। 13 मार्च 1910 को सावरकर गिरफ्तार कर लिये गये। उन पर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध राजद्रोह तथा नासिक में एक ब्रिटिश कलेक्टर ए एस टी जैक्सन की हत्या के पड्यंत्र में शामिल होने का आरोप लागाया गया। उन्हें इस अभियोग में अंडमान निकोबार द्वीप में पचास वर्ष के आजीवन काले पानी कारावास की सजा सुनाई गई।

अंडमान द्वीप में सावरकर पर अंग्रेज सरकार ने यंत्रणाओ की बौछार कर दी, जिससे उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया। 1924 में सावरकर को वहाँ कलकत्ता भेज दिया गया। अलीपुर जेल एवं रत्नागिरी जेलों में उन्हें क्रमशः बंद रखा गया। सन् 1937 में काग्रेस मंत्रीमंडल का गठन होने पर दस मई 1937 का सावरकर को कारावास से मुक्त कर दिया गया। मुक्त होने के बाद सावरकर पुनः स्वतंत्रता संग्राम की आग में कूद पड़े। इस बार सावरकर का राष्ट्रवाद विशुद्ध हिंदू राष्ट्रवाद था और इसी विचारधारा क कारण वे उपेक्षित रहे।

– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

एवीके न्यूज सर्विस

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अतिथि बनकर जाएं तो न दिखाएं नखरे

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भारतीय संस्कृति में “अतिथि देवो भवः” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य है। हमारे यहाँ अतिथि का आगमन शुभ माना जाता है। घर की रसोई में हलचल बढ़ जाती है, बैठक सजी-धजी लगने लगती है और मन में एक सहज उत्साह जाग उठता है कि आने वाला व्यक्ति अपनेपन और आदर का अनुभव करे। परंतु विडंबना यह है कि कभी-कभी कुछ अतिथि अनजाने में ही इस आत्मीयता पर पानी फेर देते हैं सिर्फ इस कारण कि वे चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक या परोसे गए नाश्ते को लेकर नखरे दिखाने लगते हैं।

आज के बदलते समय में खान-पान की पसंद-नापसंद स्वाभाविक है। किसी को चाय नहीं पसंद, किसी को कॉफी नहीं जंचती, कोई कोल्ड ड्रिंक से परहेज़ करता है। परंतु समस्या तब खड़ी होती है जब इन बातों को ऐसे ढंग से कहा जाए कि मेजबान असहज हो जाए। “मैं तो चाय नहीं पीता”, “कॉफी से मुझे एलर्जी है”, “कोल्ड ड्रिंक बिल्कुल नहीं”, “ये बिस्कुट नहीं खाता”, “तेल ज्यादा है” ऐसी टिप्पणियाँ यदि संवेदनशीलता के बिना कही जाएँ तो मेजबान की भावना आहत हो सकती है।

मेजबानी केवल परोसना नहीं, भावना है

जब कोई व्यक्ति अपने घर पर किसी को आमंत्रित करता है, तो वह केवल चाय या नाश्ता नहीं परोसता वह अपनी भावनाएँ, अपना समय और अपनी श्रद्धा परोसता है। वह सोचता है कि अतिथि को क्या अच्छा लगेगा, घर में क्या उपलब्ध है, कैसे स्वागत किया जाए। ऐसे में यदि अतिथि हर वस्तु में कमी निकालने लगे या बार-बार मना करता रहे, तो मेजबान के लिए स्थिति दुविधापूर्ण हो जाती है।

सोचिए, यदि आप किसी के घर जाएँ और मेजबान बार-बार पूछे—तो फिर आप क्या लेंगे?”—और हर उत्तर में ‘न’ ही मिले, तो अंततः वह क्या परोसे? उसकी आतिथ्य-भावना कहाँ व्यक्त हो? अतिथि के रूप में हमारा दायित्व भी कम नहीं है। यदि हमें किसी चीज़ से चिकित्सकीय कारणों से परहेज़ है, तो विनम्रता से पहले ही सूचित कर देना उचित है। परंतु सामान्य परिस्थितियों में जो भी स्नेहपूर्वक परोसा जाए, उसका थोड़ा-सा स्वाद लेकर धन्यवाद कहना ही शिष्टाचार है।

सच तो यह है कि अतिथि का उद्देश्य भोजन नहीं, संबंधों की ऊष्मा होना चाहिए। यदि हम केवल स्वाद और पसंद के आधार पर प्रतिक्रिया देंगे, तो संबंधों की मिठास फीकी पड़ सकती है।

‘ना’ कहने की भी एक संस्कृति हो

जीवन में हर बात स्वीकार करना आवश्यक नहीं, परंतु उसे कहने का तरीका बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि सचमुच चाय नहीं पीते, तो मुस्कुराकर कहा जा सकता है “यदि संभव हो तो मुझे सादा पानी ही दे दीजिए।” या “थोड़ी-सी चाय ले लूंगा।” इससे मेजबान को यह अनुभव होता है कि आपने उसकी भावना का सम्मान किया।

कटु या उपेक्षापूर्ण ढंग से इनकार करना सामाजिक शिष्टाचार के विपरीत है। यह ध्यान रखना चाहिए कि हम किसी होटल या रेस्तरां में नहीं, किसी के घर में बैठे हैं जहाँ औपचारिकता से अधिक आत्मीयता होती है। हम अक्सर भूल जाते हैं कि किसी के घर जाकर हम उसके संसाधनों का नहीं, उसके मन का आदर करते हैं। अतिथि का सौम्य व्यवहार ही मेजबान के लिए सबसे बड़ा उपहार होता है। यदि हम हर चीज़ में चयन और आलोचना की दृष्टि रखेंगे, तो धीरे-धीरे लोग बुलाने से कतराने लगेंगे। संबंधों की डोर बहुत कोमल होती है। एक छोटी-सी टिप्पणी भी उसमें गांठ डाल सकती है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने व्यवहार में सहजता और विनम्रता बनाए रखें। आज की पीढ़ी अधिक स्पष्टवादी है, जो अच्छी बात है। परंतु स्पष्टता और असंवेदनशीलता में अंतर है। बच्चों को यह सिखाना होगा कि अतिथि बनना भी एक कला है। यदि उन्हें कुछ पसंद न हो, तो विनम्रता से कैसे कहें; और यदि संभव हो तो थोड़ा-सा स्वीकार कर संबंधों की मिठास बनाए रखें। अतिथि बनकर जाना केवल मिलने-जुलने की औपचारिकता नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। हमें यह समझना होगा कि किसी के घर परोसी गई चाय या नाश्ता केवल खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि सम्मान और स्नेह का प्रतीक है।

आइए, हम अतिथि बनकर आलोचक नहीं, संबंधों के संरक्षक बनें। जो भी प्रेमपूर्वक परोसा जाए, उसका आनंद लें क्योंकि स्वाद से अधिक महत्त्व उस भावना का है, जिसके साथ वह हमारे सामने रखा गया है। यदि हम इतना भर सीख जाएँ, तो “अतिथि देवो भवः” केवल दीवारों पर लिखा वाक्य नहीं, हमारे व्यवहार का सजीव सत्य बन जाएगा।

डा. पंकज भारद्वाज

एवीके न्यूज सर्विस

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27 फरवरी विश्व एनजीओ दिवस :

सेवा, संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन के द्योतक

प्रतिवर्ष 27 फरवरी को मनाया जाने वाला विश्व एनजीओ दिवस विश्वभर में गैर-सरकारी संगठनों के योगदान को मान्यता देने और उनकी भूमिका पर विचार करने का अवसर प्रदान करता है। आज के समय में जब शासन-व्यवस्था जटिल होती जा रही है और सामाजिक चुनौतियाँ बहुआयामी रूप ले चुकी हैं, तब एनजीओ लोकतंत्र की एक सशक्त सहायक शक्ति के रूप में उभरे हैं।

भारत में सेवा और लोककल्याण की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। ‘दान’, ‘सेवा’ और ‘परमार्थ’ की भावना हमारे सांस्कृतिक मूल्यों में रची-बसी है। आधुनिक अर्थों में एनजीओ भले ही स्वतंत्रता-उत्तर काल में संगठित रूप से विकसित हुए हों, किंतु उनके बीज समाज-सुधार आंदोलनों में पहले से विद्यमान थे।

स्वाधीनता संग्राम के दौरान सामाजिक जागरण की धारा को दिशा देने वाले संगठनों और महापुरुषों जैसे महात्मा गांधी ने सेवा और स्वावलंबन की जो चेतना जगाई, वही आज के अनेक स्वैच्छिक संगठनों की प्रेरणा है। गांधीजी के ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ ने ग्रामोदय और समाजोदय की जो अवधारणा दी, वह आज भी एनजीओ कार्यप्रणाली का आधार है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सरकारी योजनाओं का अंतिम छोर तक पहुँचना एक चुनौती है। आधुनिक वैश्विक कल्याण संस्थान (ट्रस्ट) जैसे सैकड़ों एनजीओ निम्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिक्षा और साक्षरता – वंचित वर्गों तक शिक्षा की पहुँच।स्वास्थ्य सेवाएँ – ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य जागरूकता।महिला सशक्तिकरण-स्व-सहायता समूह, कौशल विकास। पर्यावरण संरक्षण- जल, जंगल, जमीन की रक्षा।मानवाधिकार और सामाजिक न्याय : हाशिए पर खड़े समुदायों की आवाज़ बनना।ग्रामीण भारत में कार्यरत अनेक संगठन ‘सरकार और समाज’ के बीच सेतु का कार्य करते हैं। वे नीतियों के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में भी सहायक होते हैं।
हाल के वर्षों में एनजीओ क्षेत्र पर कई प्रकार के प्रश्न भी उठे हैं। वित्तीय पारदर्शिता, विदेशी अनुदान विनियमन, और जवाबदेही को लेकर।(एफसीआरए) जैसे कानूनों ने विदेशीऊ अनुदान प्राप्त करने की प्रक्रिया को नियंत्रित किया है, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।परंतु यह भी आवश्यक है कि नियमन और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बना रहे, ताकि वास्तविक सामाजिक कार्य बाधित न हो।

लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता; वह निरंतर संवाद, सहभागिता और उत्तरदायित्व की प्रक्रिया है। एनजीओ नागरिक समाज की उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सरकार की नीतियों पर रचनात्मक सुझाव देती है, विसंगतियों को उजागर करती है और समाज के कमजोर वर्गों की आवाज़ बनती है।भारतीय संदर्भ में, जहाँ सामाजिक-आर्थिक विषमता गहरी है, वहाँ एनजीओ सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं।

विश्व एनजीओ दिवस केवल प्रशंसा का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममूल्यांकन का भी क्षण है। यह प्रश्न उठाना आवश्यक है।क्या एनजीओ अपने मूल उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध हैं?क्या वे पारदर्शिता और नैतिकता के मानकों का पालन कर रहे हैं?

भारत के विकास पथ पर एनजीओ की भूमिका निर्णायक हो सकती है, बशर्ते सेवा की भावना, पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व सर्वोपरि रहें। अंततः, राष्ट्र निर्माण केवल सरकार का दायित्व नहीं-यह समाज की सामूहिक चेतना का परिणाम है। और इसी चेतना के संवाहक हैं हमारे स्वैच्छिक संगठन। कुलमिलाकर विश्व एनजीओ दिवस हमें यही संदेश देता है।”संगठित सेवा ही सशक्त समाज की आधारशिला है।”

– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

एवीके न्यूज सर्विस

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तकनीकी दावों की पारदर्शिता पर उठते सवाल

डा. पंकज भारद्वाज

देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और आधुनिक तकनीक को लेकर लगातार नए दावे किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और निजी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन कर रही हैं। इसी क्रम में हाल ही में आयोजित एक एआई समिट के दौरान प्रस्तुत एक “एआई डॉग” को लेकर विवाद खड़ा हो गया। इस प्रकरण ने न केवल संबंधित विश्वविद्यालय की साख पर प्रश्नचिह्न लगाया है, बल्कि शोध अनुदान और पारदर्शिता की व्यापक बहस भी छेड़ दी है।

बताया गया कि एक प्रमुख निजी विश्वविद्यालय, गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एआई से जुड़ी अपनी उपलब्धियों के प्रदर्शन के दौरान एक रोबोटिक डॉग प्रस्तुत किया। प्रारंभिक दावों में इसे स्वदेशी शोध एवं नवाचार का परिणाम बताया गया, किंतु सोशल मीडिया और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच चर्चा के बाद यह बात सामने आई कि यह उपकरण चीन से खरीदा गया था। विवाद बढ़ने पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्वीकार किया कि प्रदर्शित उपकरण विदेशी था।

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में देश के प्रधानमंत्री की उपस्थिति ने मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया। राष्ट्रीय मंच पर यदि किसी तकनीकी उपलब्धि को स्वदेशी नवाचार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उससे देश की प्रतिष्ठा जुड़ जाती है। ऐसे में तथ्य और प्रस्तुति के बीच किसी भी प्रकार का अंतर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

यह विवाद केवल एक रोबोटिक उपकरण तक सीमित नहीं है। चर्चा इस बात की भी है कि यदि किसी संस्थान को शोध और नवाचार के लिए बड़ी धनराशि प्राप्त होती है, तो उसके उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है। तकनीकी प्रगति के इस दौर में आंकड़ों और दावों की सत्यता की जांच उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी स्वयं उपलब्धि।

हालांकि, यह भी आवश्यक है कि किसी भी आरोप या आलोचना का निष्पक्ष परीक्षण हो। तकनीकी उपकरणों की खरीद और उनके प्रदर्शन में कई बार सहयोग, आयात या संयुक्त परियोजनाएं शामिल होती हैं। किंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब प्रस्तुति और वास्तविकता में स्पष्टता न हो।

देश आज आत्मनिर्भरता और नवाचार की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे अपने दावों में पारदर्शी रहें। शोध केवल धन या उपकरण से नहीं, बल्कि विश्वसनीयता से भी आगे बढ़ता है।

यह घटना एक चेतावनी की तरह है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी भी उपलब्धि का प्रदर्शन करते समय तथ्यात्मक शुद्धता और नैतिकता सर्वोपरि होनी चाहिए। क्योंकि तकनीक का भविष्य केवल मशीनों पर नहीं, बल्कि विश्वास पर भी टिका होता है।

डा. पंकज भारद्वाज

एवीके न्यूज सर्विस

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28 फरवरी राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर विशेष-

विज्ञान ब्रह्मांड में जीवन निर्माण और विनाश की प्रक्रिया का वृहद ज्ञान भंडार

– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

सर सीवी रमन सहित अन्य वैज्ञानिकों की उपलब्धियों का सम्मान करने के उद्देश्य से प्रति वर्ष राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का आयोजन किया जाता है । वैज्ञानिक क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के लिए‌ अनुमोदन मिलने पर, राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पूरे भारत में स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में विज्ञान दिवस मनाया जाता है। सबसे पहले 28 फरवरी 1987 को पहले राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के बाद, राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार परिषद द्वारा राष्ट्रीय विज्ञान लोकप्रियकरण पुरस्कारों की घोषणा की गई, जिसने व्यक्तियों को विज्ञान और संचार के क्षेत्र उनके योगदान के लिए मान्यता दी।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस को विज्ञान के महत्व के बारे में संदेश फैलाने और यह आम लोगों के दैनिक जीवन को कैसे बेहतर बनाता है , इस उद्देश्य से मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त इसे मनाने के निम्नलिखित उद्देश्य भी ध्यान में रखे गए हैं। 1. विज्ञान के क्षेत्र में सभी गतिविधियों, प्रयासों और उपलब्धियों को प्रदर्शित करें 2. विज्ञान में रुचि रखने वाले भारत के नागरिकों के लिए अवसर प्रदान करना 3. विज्ञान और प्रौद्योगिकी में रुचि को बढ़ावा देना और प्रोत्साहित करना।

सरल रूप में देखा जाए तो विज्ञान ब्रह्मांड में जीवन, निर्माण और विनाश की प्रक्रिया को समझने के लिए कुछ सैद्धांतिक या प्रेक्टिकल प्रणालियों का उपयोग कर हमारी दुनिया का अध्ययन है। जहां तक देखा जाए तो विज्ञान के क्षेत्र में भारत का एक समृद्ध इतिहास रहा है।जहां कई दिग्गजों ने देश को गौरवान्वित किया है। वही सीवी रमन विज्ञान के क्षेत्र के ऐसे ही एक दिग्गज हैं। इन्ही वैज्ञानिक के संस्मरण में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस भारत में 28 फरवरी को मनाया जाता है। यही वह दिन है जब देश के महान वैज्ञानिक सीवी रमन ने ‘रमन प्रभाव’ का आविष्कार किया था।

वैज्ञानिक सीवी रमन ने 28 फरवरी 1928 को ‘रमन इफेक्ट’ की खोज की थी। उन्होंने साबित किया था कि अगर कोई प्रकाश किसी पारदर्शी वस्तु के बीच से गुजरता है, तो प्रकाश का कुछ हिस्सा विक्षेपित होता है। जिसकी वेव लेंथ में बदलाव होता है। इस खोज को रमन इफेक्ट नाम दिया गया।सीवी रमन को उनके अविष्कार ‘रमन इफेक्ट’ के लिए साल 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। सीवी रमन नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले एशियाई नागरिक थे। सीवी रमन को साल 1954 में “भारत रत्न” से भी नवाजा गया था।

लोगों में विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाने और समाज में विज्ञान के प्रति जागरुकता लाने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए ही हर साल राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। यह मानव जाति की प्रगति के लिए वैज्ञानिक विश्लेषण और खोज के महत्व पर प्रकाश डालता है। यह भारतीय नागरिकों को भौतिक दुनिया को प्रभावित करने वाली घटनाओं का अध्ययन करने और समझने के लिए प्रोत्साहित करता है। भारतीय गणितज्ञ जैसे- आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त (चक्रीय चतुर्भुज के क्षेत्र सूत्र प्रदान करते हैं) और रामानुजन ने इस क्षेत्र में अग्रणी योगदान दिया है।

खगोल विज्ञानः प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने खगोल विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसमें पृथ्वी की खोज और सौर मंडल के सूर्य उपग्रह मॉडल का विकास शामिल है। ज्योतिष वेदांग: खगोलीय डेटा का उल्लेख करने वाला पहला वैदिक पाठ, 4000 ईसा पूर्व का है। चिकित्साः आयुर्वेद भारत में चिकित्सा की पारंपरिक प्रणाली, विश्व की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति से एक है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथ विभिन्न चिकित्सा एवं उनके उपचारों का विस्तृत विवरण प्रदान करते हैं।

प्रौद्योगिकी: भारत में तकनीकी नवाचार का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसमें धातु विज्ञान, जहाज निर्माण और कपड़ा उत्पादन का विकास शामिल है।सिंधु घाटी सभ्यता: का एक प्राचीन शहर मोहनजोदडो जो 4,500 साल पहले अस्तित्व में था, एक परिष्कृत सीवेज़ और जल विक्रेताओं णकी व्यवस्था थी।अंतरिक्ष रॉकेट भारत ने हाल के वर्षों में अंतरिक्ष रॉकेट में महत्वपूर्ण प्रगति की है, जिसमें वर्ष 2014 में मार्स ऑर्बिटर मिशन का सफल प्रक्षेपण और चंद्रयान 3 का चंद्रमा में दक्षिणी ध्रुव पर सबसे प्रथम बार सफल प्रक्षेपण एवं दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाले सबसे पहले देश के रूप में भारत सामने आया। भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन गगनयान कार्यक्रम पूर्व निर्धारित है जो लॉन्च होने वाला है।

सर चंद्रशेखर वेंकट रमन उन भारतीयों में से एक हैं जिन पर देश को गर्व है। इस भारतीय भौतिक विज्ञानी ने 1930 में अपनी असाधारण खोज के लिए भौतिकी में नोबेल पुरस्कार जीता था जिसे उनके नाम पर ‘द रमन इफेक्ट’ रखा गया था।जब भारत के बुद्धिमानों को याद करने की बात आती है, तो सीवी रमन एक ऐसा नाम है जो कभी नहीं छूटता।

भारत के मद्रास ( चैन्नई ) प्रांत में जन्मे, भौतिक विज्ञानी नोबेल पुरस्कार विजेता के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। ‘रमन प्रभाव’ का गौरव भारत की युवा पीढ़ी को विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में योगदान देने के लिए एक मजबूत प्रेरक शक्ति है। इसका असर वैश्विक स्तर पर भारत की महत्वपूर्ण वृद्धि के साथ देखा जा सकता है।

– सुरेश सिंह बैस शाश्वत

एवीके न्यूज सर्विस

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