गीता प्रवचन स्वाध्याय का 76 वाँ सप्ताह सफलतापूर्वक सम्पन्न : अमित परमार
जौनपुर ब्यूरो चीफ
गीता प्रवचन स्वाध्याय का 76वाँ सप्ताह ऑनलाइन माध्यम से सम्पन्न हुआ। इस सत्र में विषय का प्रवेश श्री अमित परमार द्वारा कराया गया जिसमें गीता के उपद्रष्टाचअनुमंता भर्ता भोक्ता माहेश्वर: के सार को उदाहरणों द्वारा क्रमशः आदरणीय ज्योत्सना दीदी, संजय राय और साथियो द्वारा सुन्दर ढंग से रखा गया |
कार्यक्रम का शुभारंभ ब्रम्ह विद्या मंदिर पवनार से ज्योत्सना बहन द्वारा मंगलाचरण के साथ किया गया। उन्होंने सभी को बताया कि परमात्म-शक्तिका उत्तरोत्तर अनुभव करना चाहिए,
कर्मका संकल्प करनेबाला भी परमेश्वर ही हो जाने दो और कर्मके आदि, मध्य और अंतमें सर्वत्र प्रभुको ही रहने दो।
*परमात्म-शक्ति का अनुभव*: भक्त को अपने जीवन में परमात्मा की शक्ति का उत्तरोत्तर (बार-बार बढ़ने वाला) अनुभव करना चाहिए। यह अनुभव आत्मा को परमात्मा के करीब लाता है तथा *कर्म का संकल्प*: जब कोई कर्म किया जाता है, तो उसके पीछे का संकल्प भी भगवान को समर्पित कर देना चाहिए। इसका अर्थ है कि व्यक्ति अपने हर कर्म में भगवान को ही कर्ता मानकर चलें और प्रमुख संदेश यह है कि अपने सभी कर्मों को भगवान के प्रति अर्पित करना। जीवन में परमात्मा की उपस्थिति को हर क्षण महसूस करना और आत्मसमर्पण से जीवन शुद्ध और आनंदमय बनाना चाहिए।
इसके पश्चात पैराग्राफ-आधारित व्याख्यान अमित परमार द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने बताया कि आत्मा केवल साक्षी भाव से सब देखती है, जिसे उपद्रष्टा कहा गया है। जब विवेक जाग्रत होता है, तब जीव नैतिक भूमिका में प्रवेश करता है और आत्मा अनुमंता बनकर भीतर से अनुमोदन करती है। सहयोग की भाव से जब ईश्वर को पुकारो तो वह हमेशा तैयार खड़ा मिलता है जैसे द्रौपदी ने माधव को बुलाया जैसे सूर्य भगवान अपने प्रकाश के साथ दरवाजे के बाहर खड़े होते है और दरवाजा खोले बिना हम प्रकाश से वंचित रह जाते है उसी तरह हमे सहायता के लिए ईश्वर को याद करना चाहिए | आगे ईश्वर खुद भर्ता भोक्ता की भूमिका में आता है जहा सारे कर्म हम उसे अर्पण कर देते है और यहा तक की संकल्प भी नहीं लेते और अंत में परमात्मा शक्ति प्रकट होने से आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है |
हरिजन सेवक संघ से संजय राय जी जुड़े और सभी पैराग्राफ के सार रखते हुए बताया कि *कर्म के तीन चरण*: कर्म के *आदि* (आरंभ), *मध्य* (मध्य भाग), और *अंत* (समाप्ति) में भगवान की उपस्थिति को महसूस करना चाहिए। इससे जीवन में हर कार्य ईश्वर की इच्छा से जुड़ जाता है। *भक्ति का फल*: जब व्यक्ति अपने सभी संकल्पों को भगवान को सौंप देता है, तो उसका जीवन परमेश्वरमय हो जाता है और आत्मा व परमात्मा एक हो जाते हैं। *नामदेव का उदाहरण*: नामदेव महाराज के उदाहरण से यह सिखाया गया है कि माली (कर्म करने वाला) अपने कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित कर देता है, जिससे फल भगवान की कृपा से प्राप्त होता है।
इस स्वाध्याय सत्र में देश के विभिन्न स्थानों से अनेक साधक भावपूर्वक जुड़े, जिनमें प्रमुख रूप से आदरणीय ज्योत्सना पटेल, अनिल उपाध्याय जी,सीमा देशमुख,अलका जी,
,सत्रुधन झा,दीपिका उपाध्याय
,दिलीप पवार,चतुरा रासकर
,शिवम वाडा, डॉ. सुरेश गर्ग,हेमा ब्रह्मभट्ट,मनोज मीता पांडेय,क्रति (Krati) शाह,उषा शर्मा, संदीप कुमार वर्मा,अमित कुमार सिंह,करूनेश राव,मनीषा,प्रोफेसर देवराज सिंह, विनोबा सेवा आश्रम से आदरणीय रमेश भैया जी, बिमला दीदी,सीना, मोहित तथा सर्वोदय आश्रम से कुसुम जी, नाथूराम भाई, उर्मिला दीदी आदि सहभागियों की उपस्थिति रही| इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण स्वाध्याय समूह के Facebook पेज पर लिंक और प्रत्येक रविवार शाम को 6:15 – 6:45 के बीच होता है |
कार्यक्रम के अंत में सभी सहभागियों ने यह संकल्प लिया कि गीता के संदेश को केवल सुनने तक सीमित न रखकर, उसे दैनिक जीवन में आचरण में उतारा जाए। विनोबा विचार प्रवाह और विनोबा सेवा आश्रम के संस्थापक आदरणीय रमेश भैया जी ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया और हरिजन सेवक संघ दिल्ली से आदरणीय उर्मिला दीदी ने स्वाध्याय समूह को सतत ये क्रम चलाए जाने के लिए बधाई दी और आगे से जुड़कर गीता स्वाध्याय में प्रतिभाग भी करेंगी |
साप्ताहिक स्वाध्याय में भाग लेने के लिए आप मोबाइल नंबर 9670511153 और ईमेल amitparmar47@gmail.com से जुड़ सकते है|

