रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट से मरीजों को मिली नई ज़िंदगी
आधुनिक तकनीक से सुरक्षित और सफल सर्जरी
सफल सर्जरी के बाद सामान्य जीवन की ओर लौटे मरीज
लखनऊ। कोई उम्र के आखिरी पड़ाव की तकलीफ लेकर आया तो कोई एक्सीडेंट की चोट लेकर, किसी ने खेलते हुए अपना घुटना मुड़वा लिया तो किसी की पुरानी चोट ने इतना परेशान किया कि वह हताश होने लगे। ऐसे ही तमाम पेशंट्स के जीवन में मेदांता हॉस्पिटल ने खुशियां भरने का काम किया। शुक्रवार को डायरेक्टर ऑर्थोपेडिक्स एंड रोबोटिक नीरिप्लेसमेंट सर्जन, मेदांता हॉस्पिटल डॉ. सौरव शक्ला ने नेतृत्व में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पेशंट्स ने अपने बारे में बताया तो हर कोई हैरान रह गया। इसमें घुटने से लेकर कूल्हा और कंधे तक की सर्जरी शामिल थी। जो पेशंट्स सामान्य तौर पर चल भी नहीं पाते थे सर्जरी होने के बाद वह मॉर्निंग वॉक से लेकर सीढ़ियां चढ़ने समेत रोजमर्रा के विभिन्न काम कर रहे हैं।
जब घुटनों की कार्टिलेज घिसने लगती है तो दर्द शुरू हो जाता है, घुटनों में चरमराहट आने लगती है और चलने में परेशानी होने लगती है। यह समस्या आमतौर पर 40 वर्ष की उम्र के बाद शुरू होती है और उम्र बढ़ने के साथ गंभीर होती जाती है। शुरुआती अवस्था में फिजियोथेरेपी, दवाइयों और जीवनशैली में बदलाव से राहत मिल जाती है, लेकिन जब जोड़ बहुत अधिक खराब हो जाते हैं तो जॉइंट रिप्लेसमेंट ही प्रभावी इलाज बनता है। विशेषज्ञों के अनुसार हड्डियों से जुड़ी सर्जरी में नी रिप्लेसमेंट सबसे अधिक सफल सर्जरी मानी जाती है। सर्जरी के बाद मरीज सीढ़ियां चढ़ने, बाज़ार जाने, घर के काम करने और रसोई में लंबे समय तक खड़े रहकर भोजन बनाने जैसे काम सामान्य रूप से कर पाते हैं। अब रोबोटिक नी रिप्लेसमेंट से घुटनों का अलाइनमेंट बेहद सटीक हो गया है, चीरा छोटा लगता है, अस्पताल में कम समय रुकना पड़ता है और अधिकतर मरीज सर्जरी वाले दिन ही चलना शुरू कर देते हैं। सही सावधानियों के साथ नी रिप्लेसमेंट 20 साल तक आराम से चलता है।
डॉ. सौरव शुक्ला ने कहा, “40 की उम्र के बाद अक्सर घुटनों की कार्टिलेज घिसने लगती है तो दर्द, चरमराहट और चलने में परेशानी शुरू हो जाती है। शुरुआत में दवाइयों, फिजियोथेरेपी और जीवनशैली में बदलाव से राहत मिल सकती है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ जब जोड़ बहुत ज्यादा खराब हो जाएं तो जॉइंट रिप्लेसमेंट ही सही विकल्प होता है। ये समस्या महिलाओं में अधिक देखी जाती है। पहले लोग मानते थे कि नी रिप्लेसमेंट में प्राकृतिक घुटनों वाली बात नहीं आ पाती है, लेकिन अब ऐसा नहीं है। रोबोटिक तकनीक से नी रिप्लेसमेंट बेहद सटीक हो गया है, जिससे मरीज कम दर्द में जल्दी चलने लगते हैं और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य रूप से जी पाते हैं।”
राजेश कुमार (71 वर्ष) जिनके दोनों घुटनों का टोटल नी रिप्लेसमेंट किया गया, पहले दर्द के कारण चल नहीं पा रहे थे और अब सामान्य जीवन जी रहे हैं। डॉ. अंजू पुरी (67 वर्ष), वैज्ञानिक, लेफ्ट नी रिप्लेसमेंट के बाद पूरी तरह सक्रिय हैं। प्रसिद्ध हाई स्कूल शिक्षक राजेंद्र कुमार श्रीवास्तव (77 वर्ष) का भी दोनों घुटनों का टोटल नी रिप्लेसमेंट किया गया और वे अब बिना सहारे चल रहे हैं।
26 वर्षीय अली नवाज़ खान, जिन्हें पहले हुए ट्रॉमा में कहीं और इलाज करने के बाद संक्रमण और इम्प्लांट फेल्योर की समस्या हो गई थी, पहले संक्रमण का इलाज किया गया और बाद में टोटल हिप रिप्लेसमेंट किया गया, अब वे पूरी तरह स्वस्थ हैं। मिथिलेश कुमारी (69 वर्ष), जिनके पहले दोनों घुटनों का रिप्लेसमेंट हो चुका था, बाद में दाहिने कंधे में रिवर्स शोल्डर आर्थ्रोप्लास्टी की गई, जिसके परिणाम बेहद अच्छे रहे। वहीं अभिषेक सिंह तोमर का एसीएल रिकंस्ट्रक्शन और मल्टी ट्रॉमा सर्जरी के बाद सफल उपचार किया गया। वही निश्चय कुमार बेहद गंभीर दुर्घटना का शिकार हो गए थे। वह भी अब सफल इलाज के बाद सामान्य जिंदगी जी रहे हैं।
आधुनिक रोबोटिक तकनीक और अनुभवी चिकित्सकों की टीम के कारण ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी के परिणाम लगातार बेहतर हो रहे हैं। समय पर जांच, सही सलाह और उन्नत तकनीक के माध्यम से अब घुटने, कूल्हे और कंधे की जटिल समस्याओं से जूझ रहे मरीज भी बिना दर्द के सक्रिय और आत्मनिर्भर जीवन जी पा रहे हैं।

