
देश की उपासना न्यूज़
कवि – शिवशंकर द्विवेदी।
सद्भाव हृदय में हो सबके,
चाहत रहने की साथ-साथ,
ऊंच-नीच के भावों से अब,
पाएं मां! सब जन निजात ।।
अ-मोक्ष:अभिलाषा के स्वरों के “वंदना के स्वर” शीर्षक से
मित्रों!,
आज की तिथि मानवसभ्यता के अतीत की एक महत्त्वपूर्ण तिथि है।जीवन विभिन्न परिस्थितियों में जिया जा सकता है,इस विचार को यथार्थ रूप देने के लिए दशरथनन्दन श्रीराम के रूप में परमात्मा ने लाखों वर्ष पूर्व अवतररित होकर जो आदर्श उपस्थित किया है,वह आज भी मानवीय समाज के लिए पथप्रदर्शक है।
श्रीराम के रूप में अवतरित हो कर परमात्मा ने यही सन्देश दिया कि ,जीवन अमूल्य है,जीवनपथ पर कौन-कौन सी परिस्थितियां आती हैं,यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है,जितना उन परिस्थितियों के रहते हुए भी जीवनपथ पर सहज रूप से आनन्द का अनुभव करता हुआ चला जाय।
श्रीराम आज हमारे मध्य भौतिक रूप से भले ही न हों,पर उनके द्वारा आचरित आचरण आज भी हमारा जीवनपथ प्रकाशित कर रहे हैं।
श्रीराम की एक उद्घोषणा है-
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥
श्रीराम की शरण में जाने का अर्थ है,श्रीराम के द्वारा जीवन-पथ में जिस ढङ्ग से विभिन्न परिस्थिथितियों के रहते हुए भी गमन किया गया है,हम भी उन परिस्थितियों के आने पर वैसा ही आचरण करने का प्रयास करें,ऐसा करने पर निश्चित रूप से उनका अनुगामी, भव की सभी बाधाओं को पार कर लेगा,यही महत्त्वपूर्ण आश्वासन परमात्मा ने श्रीराम के रूप में दिया गया है।
हम रामनाम का जप करें या न करें,पर राम के जीवनपथ का अनुसरण करने हेतु रामचरित्र पढ़ें और चिन्तन मनन करते हुए हृदयङ्गम करें,उनका आचरण करें,यही श्रीरा के प्रति समर्पण है।
श्रीराम हमें स्वयं के प्रति समर्पित होने की शक्ति प्रदान करें,इसी कामना के साथ-
शिवशंकर द्विवेदी।

