
तीन साल पहले ऑस्ट्रेलिया के आम चुनाव में चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियों की साख को जबरदस्त धक्का लगा था। तब एक भी ऐसी एजेंसी नहीं थी, जिसने प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन की लिबरल पार्टी की सत्ता में वापसी का अनुमान लगाया हो। सभी एजेंसियों ने विपक्षी लेबर पार्टी की जीत की भविष्यवाणी की थी।
अब तीन साल बाद लगभग सभी एजेंसियों ने एक बार फिर लेबर पार्टी के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने का अनुमान लगाया है। इन एजेंसियों का दावा है कि इस बार उन्होंने नई तकनीक का इस्तेमाल किया है। साथ ही उन्होंने सैंपलिंग में अधिक पारदर्शिता का परिचय दिया है। ऑस्ट्रेलिया में आम चुनाव के लिए मतदान 21 मई को होगा। उसी रोज परिणाम मिल जाने की संभावना है।
ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख पॉलिंग (चुनाव पूर्व सर्वेक्षण) विशेषज्ञ मरे गूट के मुताबिक पिछले चुनाव में सभी सर्वे एजेंसियों ने आम धारणा के मुताबिक भविष्यवाणी की। उन्होंने नमूनों (सैंपल) का स्वतंत्र ढंग से परीक्षण नहीं किया। भविष्यवाणी गलत साबित होने के बाद इन एजेंसियों ने जो पड़ताल की, उससे सामने आया कि मतदाताओं के मूड में आखिरी वक्त में कोई बदलाव नहीं आया था। ना ही ऐसा हुआ कि मतदाताओं ने जानबूझ कर अपनी पसंद सर्वेक्षण कर रहे लोगों को नहीं बताई हो। इसका मतलब यह है कि एजेंसियों ने जनमत की सटीक नुमाइंदगी करने वाले सैंपल नहीं चुने।
विशेषज्ञों के मुताबिक ज्यादातर सर्वे एजेंसियां ऑनलाइन माध्यम से लोगों की राय जानती हैं। रॉय मॉर्गन और इस्पोस इसका अपवाद हैं, जो टेलीफोन इंटरव्यू के जरिए सैंपल के रूप में चुने गए लोगों की पसंद मालूम करती हैं। इन दोनों एजेंसियों का दावा है कि वे अनुमान लगाते समय जनसंख्या के स्वरूप और सामाजिक-आर्थिक संरचना संबंधी सूचनाओं का भी ख्याल करती हैँ।
सोशल रिसर्चर रिबेका हंटली की राय में 2019 में एक समस्या यह रही कि जो आम धारणा बनी हुई थी, उसकी ही पॉलिंग एजेसिंयों ने भी पुष्टि कर दी। हंटली ने अखबार द गार्जियन से कहा- ‘उस समय आम समझ थी कि लेबर पार्टी जीतने जा रही है। लिबरल पार्टी बिखरी हुई लग रही थी। ऐसा लगता है कि सर्वे एजेंसियों ने इसी आम समझ के आधार पर भविष्यवाणी कर दी।’
ऑस्ट्रेलिया में 151 सदस्यों की संसद के चुनाव के लिए मतदान होगा। इसमें लगभग एक करोड़ 70 लाख मतदाता हैं। इस बार भी सर्वे एजेंसियों का आम अनुमान है कि लेबर पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनेगी। औसतन उसे 54 फीसदी मतदाताओं का समर्थन मिलता बताया गया है। सर्वे एजेंसियों का कहना है कि पिछली बार से सबक लेकर इस बार उन्होंने सैंपल तय करने और सैंपल से मिले जवाब का विश्लेषण करने के तरीकों में बदलाव किया है।
द गार्जियन के लिए सर्वे करने वाली एजेंसी इसेन्शियल मीडिया के कार्यकारी निदेशक पीटर लुईस का कहना है कि पिछली बार सर्वे एजेंसियों ने एक जैसा ही तरीका अपनाया था। इस बार उन सबकी विधि में अंतर है। विशेषज्ञों ने कहा है कि चुनाव सर्वे दूसरे लोकतांत्रिक देशों में भी गलत होते रहे हैं। लेकिन ऐसा होने पर एजेंसियों की साख पर सवाल उठते हैँ। इसलिए ऑस्ट्रेलिया में इस बार उन्होंने अधिक सावधानी बरती है।

