गीता प्रवचन स्वाध्याय का 83वाँ सप्ताह सफलतापूर्वक सम्पन्न : अमित परमार

गीता प्रवचन स्वाध्याय का 83वाँ सप्ताह सफलतापूर्वक सम्पन्न : अमित परमार
देश की उपासना ब्यूरो जौनपुर।
गीता प्रवचन स्वाध्याय का 83वाँ सप्ताह ऑनलाइन माध्यम से सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस सत्र में गीता अध्याय 14 के “स्वाभाविकत्वात्” विषय पर चिंतन किया गया। श्री अमित परमार द्वारा विषय का प्रवेश कराया गया। उन्होंने बताया कि स्वधर्म स्वाभाविक होता है। मनुष्य को अपने स्वधर्म को अलग से खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वह उसके जन्म, परिस्थिति और स्वभाव के साथ ही प्राप्त हो जाता है। इसी संदर्भ में उन्होंने गहन विचार प्रस्तुत किए।

30 मिनट के इस साप्ताहिक स्वाध्याय में ब्रह्म विद्या मंदिर पवनार से आदरणीय ज्योत्सना दीदी, तथा स्वाध्याय परिवार से दीपिका उपाध्याय जी और दिलीप पवार जी द्वारा विचार प्रस्तुत किए गए। सभी वक्ताओं ने विषय को सरल और सारगर्भित ढंग से स्पष्ट किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ ब्रह्म विद्या मंदिर, पवनार से ज्योत्सना बहन द्वारा मंगलाचरण के साथ किया गया। उन्होंने बताया कि मनुष्य को दूर की आकर्षक बातों के मोह में पड़ने के बजाय अपने निकट के कर्तव्य को स्वीकार करना चाहिए। स्वधर्म मनुष्य को स्वाभाविक रूप से प्राप्त होता है और उसे अलग से खोजने की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य को अपने निकट के कर्तव्यों और सेवा को ही स्वीकार करना चाहिए तथा दूर के आकर्षण में पड़कर अपने स्वधर्म से विचलित नहीं होना चाहिए। स्वधर्म में स्थिर रहने से मन एकाग्र होता है और जीवन की ऊर्जा सही दिशा में लगती है।

दीपिका उपाध्याय जी ने बताया कि स्वधर्म स्वाभाविक होता है क्योंकि वह मनुष्य को उसके जन्म, परिस्थिति और स्वभाव के साथ ही प्राप्त हो जाता है। जिस परिवार, समाज और वातावरण में मनुष्य जन्म लेता है, वहीं से उसके कर्तव्य और सेवा का मार्ग स्वाभाविक रूप से सामने आता है। अपने माता-पिता, पड़ोस और समाज की सेवा करना ही स्वधर्म का सहज रूप है। परंतु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जो कार्य केवल सुविधा या छल से सामने आए, वह सदैव धर्म नहीं होता।

इसके पश्चात दिलीप पवार जी ने विषय को आगे बढ़ाते हुए बताया कि मनुष्य को दूर की आकर्षक बातों के मोह में पड़ने के बजाय अपने निकट के कर्तव्य को स्वीकार करना चाहिए। जो स्वधर्म हमें प्राप्त है, चाहे वह साधारण या छोटा ही क्यों न लगे, वही हमारे लिए श्रेष्ठ है। यदि मनुष्य अपने प्राप्त कार्य को छोड़कर अन्य अवसरों की खोज में भटकता है, तो वह अपने वास्तविक कर्तव्य से दूर हो जाता है। इसलिए स्वधर्म में मन लगाकर कर्म करना ही उचित मार्ग है।

समापन वक्तव्य में आदरणीय सुरेश गर्ग और रमेश भैया जी ने बताया कि रजोगुण (Rajas) और तमोगुण (Tamas) को कम करने के लिए विशेष उपाय अपनाने चाहिए। इनमें सात्विक आहार, नियमित दिनचर्या, योग, योगासन और प्राणायाम, प्रतिदिन ध्यान, मंत्रों का स्पष्ट और ध्यानपूर्वक जप, सत्संग एवं स्वाध्याय शामिल हैं। उन्होंने कहा कि महापुरुषों की वाणी सुनना तथा भगवद्गीता और भागवत जैसे शास्त्रों का अध्ययन करना अत्यंत उपयोगी है। निस्वार्थ कर्म करते हुए फल की इच्छा का त्याग करना तथा घर और आसपास का वातावरण स्वच्छ और शांतिपूर्ण रखना भी आवश्यक है।

अंत में अमित परमार ने कार्यक्रम में जुड़े सभी सहभागियों — आदरणीय ज्योत्सना पटेल, दिलीप पवार, बिमल मुंडे जी, अनिल उपाध्याय जी, सीमा देशमुख, शत्रुधन झा, दीपिका उपाध्याय, चतुरा रासकर, शिवम वाडा, डॉ. सुरेश गर्ग, हेमा ब्रह्मभट्ट, मनोज मीता पांडेय, कृति शाह, उषा शर्मा, संदीप कुमार वर्मा, करूनेश राव, मनीषा, प्रोफेसर देवराज सिंह, आदरणीय रमेश भैया जी, बिमला दीदी, कुसुम जी, नाथूराम भाई, कविता जी, अलका प्रकाश पाण्डेय जी, शिवाकान्त जी, ओमप्रकाश जी, वर्षा शाह जी तथा अन्य सभी साथियों को स्वाध्याय परिवार में नियमित रूप से जुड़ने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।

यह साप्ताहिक स्वाध्याय प्रत्येक रविवार सायं 6:15 से 6:45 बजे ऑनलाइन आयोजित होता है। स्वाध्याय से जुड़ने के इच्छुक व्यक्ति मोबाइल नंबर 9670511153 अथवा ईमेल amitparmar47@gmail.com
के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।

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