*परमात्मा को समर्पित वे कर्म जिन्हे हम भक्ति से पाते है और हृदय से परोसते है वे कर्म ही गीता मे कर्म बताया गया है*
ब्यूरो चीफ आर एल पाण्डेय
लखनऊ। ज्ञान तीर्थ पीठाधीस्वर राष्ट्रभक्त संत कर्मयोगी प्रकृति पुत्र त्यागी जी_
हमारी यात्रा नर से नारायण की है हम परमात्मा की पवित्र संताने दैवी कार्य करने भेजे गए हैं
कौन से कर्म करने चाहिए और नही करने चाहिए इस पर भ्रम की स्थिति सदा से ही चली आ रही है यह भी ईश्वर की योजना ही है चूंकि देवता – दानव, नर- नारी,सुख-दुख,तीखा-मीठा अच्छा-बुरा सब ईश्वर की माया से ही संभव है *हम तिल भर भी परिवर्तन नही कर सकते यहाँ तक कि हमारी चाह हमारी परवाह हमारी हार हमारी जीत सब परमात्मा की योजना से है*
राष्ट्रभक्त संत कर्मयोगी प्रकृति पुत्र त्यागी जी महाराज की पवित्र तपोभूमि ज्ञान तीर्थ स्वर्ग धाम विलायत कला कटनी मध्य प्रदेश भारत मे है जहा त्यागी जी सदा समय समय पर ईश्वर का संदेश समाज तक पहुंचाते ही है ।
हम सब बाहर से दिखाई देने वाले नाटक के पात्र की तरह है जिस तरह से कहानी लिखने वाला कहानीकार सब कुछ तय कर देता है और उसे कलाकार परोसता रहता है। जीवन को समझ पाना इतना सरल नहीं है लेकिन ईश्वर जो जान लेने से सब कुछ सरल हो जाता है बिलकुल उसी तरह जैसे हम माता पिता गुरू की बातों को मान उन्हे आचरण में ले आते हैं तो वही चीजे हमे आनंदित करने लगती है। *चिकित्सक द्वारा दी गई कङवी गोली भी हम सहज ही खा लेते हैं चूंकि हमे चिकित्सक पर भरोसा होता है* जब तक भरोसा नहीं होगा कार्य होकर भी नही हुआ समझे जैसै ही भरोसा दिया परमात्मा ने फिर सारी जिम्मेदारी उसकी समझ आ जाती है पहले लगता है कि सब मुझे ही करना है इतना बङा कार्य कैसे होगा लेकिन जैसे ही ईश्वर हमें मार्गदर्शन करते हैं और वह पल हमारे समझने के लिए ही होता है हम उस कार्य को करके सफ़ल हो जाते है यही ईश्वर की कृपा है यही ईश्वर योजना भी।
जब परमात्मा हमे कुछ देना चाहते हैं तो बीच मे ऐसी योजना को सामिल कर देते हैं जिससे मन,बुद्धि उसे करने व्याकुल हो जाते है इसी तरह जब हमे नीचे ले जाना चाहते हैं तो हमसे ग़लती हो जाती है वास्तव मे यह है सब माया का खेल लेकिन हमारी समझ इतनी प्रबल नही है कि हम सब कुछ समझ सके इन साधारण आखों से देख पाना कठिन है लेकिन *सदा उस परम पिता की भक्ति मे लीन रहने के अभ्यास से हमारी स्थिति सरल होकर परम सत्ता के साथ मिल जाती है* और उस समय हमारे द्वारा हर कर्म सकारात्मक ही होते जाते हैं जिन्हे परमात्मा ही करा रहे होते हैं आप हम कुछ भी तब तक नही कर सकते जब तक परम पिता की मर्जी न हो भरोसा न हो तो प्रयास करके देखें ।प्रयास और अभ्यास मे कोई बुराई नही है हा यह अवश्य है कि जब हम कोई भी कर्म ईश्वर को समर्पित करते है तो उसकी पवित्रता की बात ही निराली होती है।
*योनि चाहे कोई भी हो ईश्वर की कृपा योजना सब पर होती है* हमारे द्वारा जो पुरुषार्थ परमार्थ परमात्मा ने लौकिक जगत मे कराया उसके बाहरी पुरस्कार हमे संसार के सामने भेंट मिलते है जो हमारी पूजी नही परमात्मा की कृपा के अलावा कुछ नहीं है।
निज स्वार्थी परमात्मा को कभी पसंद नहीं आते उन्हे तो परमार्थिक पथ पर चलने वाले ही होते हैं चूंकि एक माता पिता गुरू की ही दृष्टि से देखे संस्कारों से भरी हुआ संतान ही सबको पसंद आती है फिर चाहे वह सुन्दर हो या न हो। यही हाल परमात्मा का है उसे भी संत साधक ही पसंद आते हैं *बुद्धि चातुरता से सिर्फ बाहरी दुनिया से सम्मान और सामान एकत्र कर सकते हैं* किंतु पारलौकिक सत्ता तो निस्वार्थ प्रेम समर्पण से ही मिलेगा हा भ्रम से निकलना होगा संसार का जाल बहुत कठिन है परीक्षा सतत् चलती रहती है हमे लगे न लगे।
परमात्मा को प्रेम से पाकर ही प्रेम पाया जा सकता है।
धन का मद सुन्दरता का अहंकार भीङ का दंभ सब बर्बाद करने की सीढी है आज ऊंचे पद पर तो कल सङक पर सम्मान आया या गया ।लेकिन एक ऐसा मार्ग है *जहा किसी पद की लालसा नहीं फिर भी परम पिता की गोद का आनंद मिलता ही जाता है* जिसे कोई परम सुख कहता तो को सत-चित आनंद यही है सच्चा कर्म जिसे अपने हित को छोङ परमात्मा को समर्पित करें वे ही हमे पार लगायेंगे जिन्होंने जङ चेतन सबको सही स्थान दिया वे हमारे लिए भी उतने ही उदार है सदा।
उस परम सत्ता मे सदा लीन रहने की कला ही जीवन की असली कला है बाकी तो कही रंगीन और रंगहीन ही है ।
बहुत बार हम अकर्म,विकर्म को ही कर्म मान लेते है जबकि सत्य कर्म जिसे सत्कर्म कहते हैं वही परम पवित्र कर्म है जिसे ईश्वर को समर्पित किया जा सकता है। *चोरी,झूठ,फरेब,आलस्य आदि से कमाया धन परमात्मा स्वीकार ही नही करते उन्हे तो हृदय की पवित्रता का भाव ही चाहिये* जिसकी क़ीमत का आंकलन संभव ही नही इसीलिये साधक सब कुछ छोङकर परम पद को पाता है और संसारी संसार के मोह मे सदा जलता ही रहता है ।
देखने में दोनों एक से दिखाई देते हैं आख कान नाक मुह हाथ पैर सब कुछ लेकिन अंदर जो प्रेम कि आनंद की अविरल धारा का आनंद सिर्फ सरलता,निस्वार्थ प्रेम,बुद्धि से दूर होकर ही पाया जा सकता है।
जिसमें जाति पंथ मजहब कोई आङे नही आते क्योकि *हम सब उस एक सत्ता की ही संतान है वह अपनी अच्छी और सच्ची संतानों से भेद नहीं करता* तो हम क्यो जहर पीते भी है और पिलाते भी है। जीवन को सुखद बनाये ईश्वर को अपनाऐ उसके हो जायें।
*सेवार्थ*
राष्ट्रभक्त संत कर्मयोगी प्रकृति पुत्र त्यागी जी आश्रम विश्व सेवा समिति ज्ञान तीर्थ स्वर्ग धाम विलायत कला कटनी मध्य प्रदेश भारत यहाँ होता है संस्कृति का उत्थान मानव बने देवता
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