भगवान महावीर केवलज्ञान कल्याणक दिवस पर विशेष आलेख एवं विचार

भगवान महावीर केवलज्ञान कल्याणक दिवस पर विशेष आलेख एवं विचार

भगवान महावीर केवलज्ञान कल्याणक दिवस पर भगवान महावीर के चरणों में मेरा भावों से शत – शत वन्दन एवं इस अवसर पर मेरे भाव –
सर्वत्र छाईं खुशियाँ कण – कण में भरा उल्लास ।
अर्हत – वाणी का अमृत पिये हैं शीतल चन्दन ।
महावीर हैं भगवान भक्तों के आस्थान ।
महावीर प्रभु का जग हैं पुजारी ।
महावीर के चरणों में करते है वन्दन ।
आते ही आज का दिन ख़ुशियों से होते सरोबार ।
तप त्याग क्षमा मैत्री की हरियाली मुसकाती ।
मन उपवन में इठलाती बासंती छटा सुहानी ।
हमें भी उबारो तारो करुणा – सदन ।
अनेकांत दर्शन करता सबके उजाला ।
सत्य के महासागर का नीर हैं निराला ।
राग द्वेष की ज्वाला का करता शमन ।
अधिकार मोक्ष का सबको होता ।
उपदेश अहिंसा का हैं सुखकारी ।
हिंसा की आगे बुझाने में हैं सातकारी ।
कोई न अधम उतम सबक होते समान ।
श्रद्धा भर सुमनों से आरती उतारें ।
आस्था के आस्थान की गुण – गाथा गायें ।
रूं – रूं में पुकारे महावीर शाम सवेरे ।
महके फुलवारी में श्रद्धा के भाव हमारे |

*++युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी का 16 वां पट्टोंत्सव दिवस ++*
परम आराध्य प्रातः स्मरणीय पूज्य गुरूदेव युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के 16 वां पट्टोत्सव दिवस पर भावों से मेरा गुरुदेव को शत – शत वन्दन व इस अवसर पर मेरे मन के उदगार श्री चरणो में –
आचार्य श्री महाश्रमण जी का पट्टोत्सव दिवस का उत्सव प्यारा ।
अंतर आलोक जगाने का व सबको लगता मनहारा दिन प्यारा ।
सबके ये चेहरे खिले हैं मानो सर्वत्र बहार आई हैं ।
विहगों ने गीत गाया हैं हवा भी आज मुसकुराई हैं ।
गुरुवर की साधना आराधना का तेज सुहावना हैं ।
समता के गुणों का आपने किया अविरल विकास हैं ।
काम क्रोध मूर्च्छा को हटाने की और आपने कदम बढ़ाये हैं।
जिनवाणी जल सींचे , अपनी आत्मा को संवाया हैं ।
अव्रत से व्रत की और बढ़ बाहर से भीतर आप मुड़ें ।
संयम को आपने जीवन की सुख शय्या बताई हैं ।
साधु जीवन को वरदान बता भैक्षव गण को महका रहे ।
तप जप मौन ध्यान से साधना को आपने उच्चाईयां प्रदान की है।
आप जैसे गुरुवर को पाकर हमारा भाग्योदय संवाया है ।
जन मन में नव दीप जलाकर शासन फुलवारी को महका रहे हैं ।
नन्दन वन – सा अविरल भैक्षव शासन हमने पाया हैं ।
आचार्यश्री महाश्रमणजी गुरूवर का हमको वरदायी साया हैं।
** विश्व विभूति0**
कवींद्र रवींद्रनाथ टैगोर –
कहते है कि संकल्प के बिना कोई मुक़ाम कभी हासिल हो यह सम्भव नहीं है । वह बिन इच्छा शक्ति के हम योग्य होते हुए भी कोई भी कार्य नहीं कर सकते है जैसे – आत्मा कभी भी परमात्मा नहीं बन सकती है आदि – आदि ।विश्व विभूति कवींद्र रवींद्रनाथ टैगोर ! एक संवेदनशील व बहुआयामी व्यक्तित्व तो थे ही साथ में वे एक उच्च कोटि के कहानीकार, निबंधकार,
संगीतकार, चित्रकार आदि भी थे । उनका जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता में एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था ।उनके पिता का देबेंद्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था ।उन्होंने ब्राइटन, इंग्लैंड में एक पब्लिक स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में कानून का अध्ययन करने के लिए लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन इसे छोड़ दिया था । उन्होंने कविता, उपन्यास, नाटक, संगीत और निबंधों सहित विभिन्न विधाओं में लिखा। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में गीतांजलि , गोरा , चोखेर बाली और घरे बाइरे आदि शामिल हैं । उनकी रचनाएँ जन गण मन ( भारत का राष्ट्रगान) और आमार सोनार बांग्ला (बांग्लादेश का राष्ट्रगान) दो देशों के राष्ट्रगान हैं । आपने शिक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने 1901 में शांतिनिकेतन की स्थापना की जो बाद में विश्व भारती के रूप में विश्वविद्यालय बन गया था । वे एक प्रसिद्ध समाज सुधारक थे और उन्होंने सामाजिक बुराइयों जैसे बाल विवाह और दहेज प्रथा के आदि के खिलाफ आवाज उठाई । उन्होंने भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने और पूर्वी और पश्चिमी दुनिया के बीच संबंध स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । उन्होंने बंगाली साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया । उन्हें 1913 में भारतवर्ष में सर्वप्रथम उनकी काव्य कृति गीतांजलि पर उन्हें साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार मिला था । उनको इसी पर महात्मा गाँधी ने गुरुदेव की संज्ञा दी थी । 7 अगस्त, 1941 को जोरासांको हवेली (कोलकाता) में उनका निधन हो गया था । भारतीय शिक्षण पद्धति पर आधारित शिक्षा केन्द्र शांतिनिकेतन में विश्व भारती की स्थापना उनकी चिर स्मृति के रूप में अमर यादगार है जिससे प्रति वर्ष विभिन्न विधाओं में शिक्षा प्राप्त विद्वान निकलते हैं जिनके हृदय से कृतज्ञता के उद्गार निकलते हैं।कहते है कि अगर मरने के बाद भी यों जीवित रहना है तो इनमें से एक काम जरूर करना है , या तो ऐसा कुछ कर जाना जिससे हम सदैव लोगों के दिलों में बसें रहें या गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर की तरह कालजयी रचनाएँ अपने भावों से अपने लेखन में काल- भाव की अनुकूलता से लिख जायें कि लोग हमको सदा पढ़ने को लालायित हों। इन्ही शुभ भावों से ऐसी विरल विभूति कवींद्र रवींद्र को आज उनकी जन्म जयंती पर हम भाव भरी श्रद्धांजलि श्रद्धासिक्त भावांजलि देते हैं ।
प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ ) राजस्थान

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