रामायण कालीन विसुही नदी के शिलान्यास पत्थर पर नाला लिखने से जनता में दिखा आक्रोश

अयोध्या।(डाक्टर अजय तिवारी जिला संवाददाता)
रामनगरी में रामायण कालीन विसुही नदी को नाला लिखने पर लोगों की आस्था को चोट पहुंची हैlइसके लिये ग्रामीणों ने इसके लिए दोषी अधिकारियों पर कार्यवाही कर उन्हें दंडित करने की मांग की हैlयह नदी अवध क्षेत्र की पहचान थी और भगवान श्रीराम ने वन गमन के समय सबसे पहले यहीं विश्राम किया थाl महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी इसी नदी के तट पर होने का उल्लेख मिलता है जैसा की पौराणिक विसुही नदी पर रपटा पुल का निर्माण कराया जा रहा। बताते चले कि हैदरगंज के हारीपुर में पौराणिक विसुही नदी को नाला दिखा शिलान्यास का पत्थर कार्यदाई संस्था द्वारा लगा दिया गया है।जिसको लेकर ग्रामीणों में आक्रोश व्याप्त है।अयोध्या जनपद के विकास खंड तारुन अंतर्गत हारीपुर गांव से होकर बह रही पौराणिक विसुही नदी पर रपटा पुल का निर्माण कराया जा रहा है।स्थानीय ग्रामीण में बब्बन प्रसाद,बाबू राम, राम कुमार गौड़,जमुना प्रसाद की मानें तो कार्यदाई संस्था ने यह शिलापट बाद चुपके से लगा दिया।इस पर रामायण कालीन विसुही नदी को ही नाला दिखाकर शिलान्यास बताया गया है। विनय कटियार ने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं हैं यह अचरज की बात है कि लगाए गए बोर्ड पर पूर्व भाजपा सांसद विनय कटियार,पूर्व भाजपा विधायक खब्बू तिवारी,ब्लाक प्रमुख सुशीला वर्मा, ब्लाक प्रमुख प्रतिनिधि फयाराम वर्मा का नाम भी अंकित है। कार्यदाई संस्था का नाम प्रांतीय लोक खंड विभाग तो लिखा है। पर किसी अधिकारी या कर्मचारी का न तो नाम लिखा है और न ही लगने वाली लागत ही लिखी गई है।जिसका ग्रामीणों ने विरोध शुरू कर दिया है। भाजपा के पूर्व सांसद विनय कटियार ने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं हैंl यदि धार्मिक आस्था से जुड़ी नदी को नाला लिख गया है तो यह गलत है और इसे बदला जाना चाहिएl महर्षि वाल्मीकि का आश्रम तमसा नदी के तट पर था ऐसा उल्लेख रामायण में है। मालूम हो किआदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण में तमसा नदी का वर्णन किया है।बताया जाता है कि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम तमसा नदी के तट पर था। कटेहरी क्षेत्र के धार्मिक स्थल श्रवण क्षेत्र में नदी का संगम बिसुही नदी से हुआ है।मवई का लखनीपुर, बीबीपुर, बरौली, करौंदी, नरौली ग्राम के साथ रामपुरभगन व गोसाईगंज कस्बे इसी नदी के तट पर बसे हैं।तमसा नदी के घाटों से पौराणिक स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।रामपुरभगन का गौराघाट, गोसाईगंज का महादेवा व सत्संग घाट सहित ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व रखने वाली तमसा नदी आज प्रदूषण व जहरीली हो जाने के कारण अभिशप्त है। औद्योगिक इकाइयों के कचरे से पवित्र नदी का जल प्रदूषित हो गया है जो मछलियों, पशु-पक्षियों व मनुष्य के लिए घातक साबित हो रहा है।
रामचरित मानस में भी है इस नदी का उल्लेख है, पौराणिक तमसा नदी कभी अवध क्षेत्र की पहचान हुआ करती थी।वन जाते समय श्रीराम-लक्ष्मण व सीता ने अयोध्या के बाहर सर्वप्रथम तमसा नदी के तट पर विश्राम करके इसको धन्य बना दिया था। इसका उल्लेख गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरित मानस में ‘प्रथम वास तमसा भयो दूसर सुरसरि तीर’ के माध्यम से किया है।परंतु समाजसेवियों,नेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों की घोर उदासीनता के चलते यह नदी अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही है। पहले की जनता कभी इस नदी का पानी पीकर  गर्मी व अन्य मौसम में अपनी प्यास बुझा लेते थे। अब यह न तो जीवनदायिनी ही रही और न ही इसका पानी आचमन योग्य है।कभी इस नदी का पानी पीकर लोग गर्मी व अन्य मौसम में अपनी प्यास बुझा लेते थे परंतु कालांतर में नदियों के भरपूर दोहन और दुरुपयोग होने के कारण इसका पानी अब स्वच्छ नहीं रह गया है। गर्मी के मौसम में यह नदी कहीं-कहीं अक्सर सूख जाती है या फिर कहीं पर कम दूषित पानी ही रहता है। अवध क्षेत्र की प्रमुख नदियों में अपनी पहचान बनाने वाली इस नदी को मड़हा व तमसा के नाम से भी जाना जाता है। इस नदी का उदगम् स्थल मवई के ग्राम लखनीपुर में माना जाता है। यहां पर एक सरोवर से इसका अभ्युदय हुआ है।तमसा नदी मवई, रुदौली, अमानीगंज, सोहावल, मिल्कीपुर, मसौधा, बीकापुर और तारुन आदि विकास खंडों से होते हुए फैजाबाद से अम्बेडकरनगर व गोसाईगंज के पास तक प्रवाहित होती है।

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