24 दिसम्बर- श्रीरामचरितमानस,
नमो राघवाय 🙏
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु
तुम्ह सन् सहज सनेहु ।
बसहु निरंतर तासु मन
सो राउर निज गेहु ।।
( अयोध्याकाण्ड, दो. 131)
राम राम🙏🙏
वन गमन करते हुए राम जी बाल्मीकि जी के आश्रम आते हैं । मुनि जी से अपने रहने का स्थान पूछते हैं । 14 स्थान बाल्मीकि जी उन्हें बताते हैं । सबसे अंत में वे राम जी से कहते हैं कि जिसको आपसे कभी कुछ न चाहिए व जो आपके प्रति स्वाभाविक प्रेम रखता हो उसके मन में सदा आप निवास करें , वही आपका घर है ।
बाल्मीकि जी ने इस दोहे में दो बातें बताई हैं , एक तो जो राम जी से कभी कुछ न माँगे, दूसरा जिसका राम जी के प्रति स्वाभाविक प्रेम हो उसके मन में निवास करें । इन दोनों बातों में हम आप खरे नही उतरते हैं । राम जी से मांगने की तो हमने कभी न समाप्त होने वाली लम्बी लिस्ट बना रखी है व दूसरा राम जी के प्रति हमारा स्वाभाविक प्रेम नहीं है , वह आवश्यकता परक है । इसलिए राम जी हमारे मन से दूर हैं । अपने मन में आप राम वास चाहते हैं तो अपनी माँग लिस्ट पीछे रखते हुए केवल राम भजें , बात बन जाएगी । अथ ! भज श्रीरामम् , भज श्रीरामम् , राम राम 🚩🚩
तरुण जी द्वारा संकलित

