अयोध्या सदर में विपक्ष की फील्डिंग में फंसी है भाजपा

अयोध्या।(राजेश श्रीवास्तव ब्यूरो चीफ अयोध्या)
एक बार फिर दस साल बाद फिर भाजपा अपने गढ़ में ही पसीने-पसीने हो गई।राजनीतिक जानकारो के मुताबिक विपक्ष की जोरदार फील्डिंग ने उसे हैरान कर दिया है।इस बार राममंदिर के निर्माण व रामजन्मभूमि की मिट्टी का चुनावी प्रसाद भी भाजपा को उसके गढ़ में विपक्ष की तगड़ी फील्डिंग से नहीं उबार पा रहा हैlराष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की यहां के मंदिरों में रोज हो रही बैठकें भी उसकी मुश्किलों का आसान करती नजर नहीं आ रही हैंlयहां मतदान में पखवारे भर से भी कम समय शेष है और भाजपा चमत्कार के भरोसे दिख रही है। भाजपा को अपने गढ़ अयोध्या में जीत के लिए रामलला का ही सबसे बड़ा भरोसा है। भाजपा को अपने गढ़ अयोध्या में जीत के लिए रामलला का ही सबसे बड़ा भरोसा है। अंततः साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पर सिमट कर रह जाताहै वहि वर्ष 1990 में राम मंदिर आंदोलन के उभार से अयोध्या सदर की विधानसभा सीट पर काबिज हुई भाजपा ऐसे समय में उलझ गई है,जबकि मंदिर का निर्माण जोर शोर से चल रहा है।मंदिर मुद्दे के उभार और ढलान दोनों ही हालात में भाजपा केवल एक बार बोल्ड हुई।राम मंदिर के भावनात्मक रूप से जुड़ी सीट होने के नाते चुनाव अंततः साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पर सिमट कर रह जाता रहा है।अब राम मंदिर का निर्माण हो रहा है, बावजूद इसके भाजपा दस साल बाद एक बार फिर अपने ही गढ़ में पसीने-पसीने है। अधिकारियों और दल के नेताओं की जुगलबंदी और तनातनी ने हालात मुश्किल किए। भाजपा के फंसना अकारण नहीं है।भाजपा को उलझन में डालने में पांच साल के कार्यकाल में मची उथल पुथल का खासा योगदान रहा है।बीते 31 सालों भाजपा के सामने ऐसी चुनौती कभी नहीं रही, भले ही वह नए परिसीमन से बिगड़े समीकरण में एक बार चुनाव हार गई।भाजपा के राह में रोड़े यहां तैनात रहे प्रशासनिक अधिकारियों और दल के नेताओं की जुगलबंदी और तनातनी के चलते बिछ गए। पहले भगवान श्री राम की प्रतिमा के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर भाजपा की किरकिरी हुई।उसके बाद अयोध्या एयरपोर्ट का मामला उलझा रहा।रही सही कसर अयोध्या धाम की सड़कों को चौड़ा करने की योजना को लेकर उपजे व्यापारियों के असंतोष ने पूरी कर दी। महायोजना ऐन चुनाव के ठीक पहले पेश कर दी गई जिससे असंतोष बढ़ा है वहीं नगर आयुक्त की मनमानी से महापौर व पार्षदों के बीच तल्खी ने और स्थिति बिगाड़ी। रही सही कसर नई महायोजना ने पूरी कर दी है, जिससे पूरे महानगर में हड़कंप मचा हुआ है। इन्हीं नगर आयुक्त ने जिनके पास अयोध्या विकास प्राधिकरण के सचिव का भी प्रभार है।यह महायोजना ऐन चुनाव के ठीक पहले पेश कर दी गई है और व्यापारी वर्ग जो भाजपा का मजबूत समर्थक माना जाता है,वह नाराज है।विधानसभा चुनाव में अयोध्या सदर की सीट हमेशा से भारतीय जनता पार्टी के खाते में जाती रही है।क्षेत्र में बीजेपी की फील्डिंग इतनी मजबूत है कि 31 साल में केवल एक बार ही बोल्ड हुई है।राम मंदिर आंदोलन के समय से बीजेपी ने यहां ऐसा स्टंप गाड़ा कि विपक्षी टीम खिलाड़ियों को बोल्ड करने में हाँफती रही है। इस बार भी विपक्ष के लिए चुनौतियां कम नहीं है।अयोध्या की इज्जत बचाने का हवाला देकर भाजपा वोट डलवाने में कामयाब होती रही है। रामनगरी की धरती की खास बात है कि प्रत्याशी से नाराजगी वोट की तारीख नजदीक आते- आते कम होने लगती है। अंत मे अयोध्या की इज्जत बचाने का हवाला देकर पार्टी कमल के चुनाव चिन्ह पर वोट डलवाने में कामयाब होती रही है।अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की आहट के साथ यहां और आसपास शुरू हुए जमीन की खरीद- फरोख्त के खेल ने भी खूब गणित बिगाड़ा है।जन प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी दोनों ही इस खेल में शामिल रहे और अब सबकी जांच चल रही है। विधायक से भी नाराजगी का असर साफ देखा जा रहा है। ये मुद्दे तो परेशानी खड़ी कर ही रहे हैं, वहीं विधायक से भी नाराजगी का असर साफ देखा जा रहा है। दल की अंतर्कलह कोढ़ में खाज का काम कर रही है। हालांकि की प्रचार अभियान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रियता और पार्टी के चुनाव प्रबंधन को लेकर चल रही सतत मानीटरिंग ने हालात को थोड़ा संभाला है। फिर भीजिले की पांच विधानसभा सीटों में से अयोध्या सदर हमेशा से सुर्खियों में रही है। राममंदिर की लहर के बाद 1991 से अब तक कुछ कुल मिलाकर सात बार चुनाव हो चुके है।जिसमें 6 बार कमल खिला और केवल एक बार साइकिल चल सकी । 2012 में सपा ने यहां से जीत का स्वाद चखा।इसका संदेश पूरे भारत मे गया कि बीजेपी अपने गढ़ को भी नही बचा पाई। लेकिन बीजेपी ने 2017 का चुनाव जीत कर लोगों अपने होने का एहसास फिर से करा दिया। 2022 में एक बार फिर वह मुश्किल में दिख रही हैl2012 के चुनाव में समीकरण सपा के पक्ष में चला गया और तेज नारायण पांडे जीत गए।वही 2012 के चुनाव में समीकरण सपा के पक्ष में चला गया और तेज नारायण पांडे जीत गए।भाजपा के क्षत्र लल्लू सिंह को हराकर भाजपा का घमंड तोड़ दिया था।राम मंदिर आंदोलन ने भाजपा को ना सिर्फ संजीवनी प्रदान की बल्कि अयोध्या को राजनीति की ऊर्जा स्थली के साथ-साथ भाजपा के गढ़ के रूप में बदल दिया।1991 से इस सीट भाजपा का कमल खिलता रहा और राम नगरी भाजपा के गढ़ के रूप में विख्यात हो गई। 2012 के चुनाव में चुनावी समीकरण सपा के पक्ष में चला गया और युवा सपा नेता तेज नारायण पांडे ने भाजपा के क्षत्र लल्लू सिंह को हराकर भाजपा का घमंड तोड़ दिया था।

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