बरेली : कमल सक्सेना कवि गीतकार एवं साहित्यकार द्वारा प्रस्तुत कैलेंडर नव वर्ष पर एक रचना
जैसे साजन की गलियों से एक दीवाना चला गया।
हमको थोड़े दुख सुख देकर साल पुराना चला गया।
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कुछ कलियाँ कुछ कांटें देखे हमने अपने आँगन में।
हमको ये मालूम नहीं क्या लिया है अपने दामन में।
न जाने अपने आँगन से कौन खजाना चला गया।
हमको थोड़े दुख सुख देकर साल पुराना चला गया।
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हमने भी तो हँसते रोते कितने सपन सजाये थे।
हम ये समझ न पाये अपने कौन हैं कौन पराये थे।
एक आवारा झोका आया सपन सुहाना चला गया।
हमको थोड़े दुख सुख देकर साल पुराना चला गया।
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हमने माना ये जीवन तो आशा और निराशा है।
फिर भी आने वाले कल से हमको पूरी आशा है।
इक दिन लौट आयेगा जो होठों से गाना चला गया।
हमको थोड़े दुख सुख देकर साल पुराना चला गया।
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नये साल से कमल कामना घर घर में खुशहाली हो।
सब आपस में मिले प्रेम से पेट न कोई खाली हो।
शायद झूठी आशा देकर एक जमाना चला गया।
हमको थोड़े दुख दुख देकर साल पुराना चला गया।
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