भारत के सातवें राष्ट्रपति एवं पूर्व गृहमंत्री पूर्व मुख्यमंत्री पंजाब सरकार एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सरदार विश्वकर्मा शिरोमणि विश्वकर्मा रत्न ज्ञानी जैल सिंह की पुण्यतिथि पर शत शत नमन

पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा का पुण्यतिथि व साहित्य दर्शन

श्री विश्वकर्मा मंदिर आदमपुर जौनपुर में श्री विश्वकर्मा पूजा महासमिति जौनपुर के तत्वाधान में भारत के सातवें राष्ट्रपति विश्वकर्मा समाज के गौरव ज्ञानी जैल सिंह की पुण्यतिथि मनाया गया

भारत के सातवें राष्ट्रपति को सत-सत नमन।कृष्ण कुमार विश्वकर्मा

ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा भारत के सातवें राष्ट्रपति थे इनका जन्म 5 मई, 1916 को पंजाब के फरीदकोट जिले के संधवान ग्राम में हुआ था। छोटी उम्र में ही ज्ञानी जेल सिंह की माता का देहांत हो गया था. इनका पालन-पोषण इनकी माता की बड़ी बहन द्वारा किया गया ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा बहुत अमीर परिवार से नही थे मध्यम वर्ग लालन पालन हुआ था उनके पिता किशन सिंह जो बढ़ई का कार्य करते थे।

ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा स्वतंत्रता सेनानी थे। दीपक आर विश्वकर्मा

मात्र 15 वर्ष की आयु में ही वह ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध काम कर रहे अकाली दल से जुड़ गए थे. अमृतसर के शहीद सिख मिशनरी कॉलेज से गुरु ग्रंथ का पाठ मुंह जबानी याद करने के बाद इन्हें ज्ञानी की उपाधि से नवाजा गया. सन 1938 में जरनैल सिंह ने प्रजा मंडल नामक एक राजनैतिक पार्टी का गठन किया जो भारतीय कॉग्रेस के साथ संबद्ध होकर ब्रिटिश विरोधी आंदोलन किया करती थी. अंग्रेजों के लिए यह सहन करना मुश्किल हो गया था.

5 वर्ष जेल वापसी में ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा नाम पड़ा। उमाकान्त विश्वकर्मा

अंग्रेजों ने ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा के विरोध प्रदर्शन को सहन नही कर पाएं ।अंग्रेजो ने ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा की आवाज को दबाने के लिए उनको जेल भेज दिया उस समय ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा को असली नाम जरनैल सिंह विश्वकर्मा के नाम से जाना जाता था उन्हें पांच वर्ष की सजा सुनाई गई. इसी दौरान उन्होंने अपना नाम बदलकर जैल सिंह (जेल सिंह) रख लिया.

ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा के ही है वंशज। सत्यनारायण विश्वकर्मा

सिक्ख धर्म सनातन धर्म की रक्षा के लिऐ सनातन धर्म की दो जातियों से बना है एक राजपूत दूसरा पूर्ण विश्वकर्मा वंश अर्थात एक हथियार चलाने वाले और एक हथियार बनाने वाले । सिक्ख धर्म में विश्वकर्मा वंश को रामगढ़िया के नाम से संबोधित किया जाता है रामगढ़ियाओ में लुहार बढ़ई का झगड़ा नहीं है रामगढ़िया पांचाल और धीमान दोनो उपनामों का भी इस्तेमाल करते है

ज्ञानी जैल सिंह का व्यक्तित्व उत्तम था। राधेश्याम विश्वकर्मा

ज्ञानी जैल सिंह बचपन से ही भारत की स्वतंत्रता के लिए जागरुक थे. छोटी सी उम्र में ही उन्होंने ब्रिटिशों के खिलाफ चल रहें आंदोलनों में अपनी सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी. वह केवल एक दृढ निश्चयी और साहसी व्यक्तित्व वाले इंसान थे

ज्ञानी जैल सिंह का निष्पक्ष था राजनैतिक सफर। अधिवक्ता वीरेंद्र विश्वकर्मा

स्वतंत्रता से पूर्व ज्ञानी जैल सिंह देश को स्वराज दिलाने और अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए विभिन्न आंदोलनों का हिस्सा बनने लगे थे. स्वतंत्रता के पश्चात ज्ञानी जैल सिंह को पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्यों के संघ (PEPSU) का राजस्व मंत्री बना दिया गया. 1951 में जब कॉग्रेस की सरकार बनी उस समय जैल सिंह को कृषि मंत्री बनाया गया. इसके अलावा वह 1956 से 1962 तक राज्यसभा के भी सदस्य रहे. सन 1962 में कॉग्रेस के समर्थन से ज्ञानी जैल सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री बने. 1980 के चुनावों में ज्ञानी जैल सिंह लोकसभा के सदस्य निर्वाचित होने के बाद इन्दिरा गांधी सरकार के कैबिनेट में रहते हुए गृह मंत्री बनाए गए. 1982 में नीलम संजीवा रेड्डी का कार्यकाल समाप्त होने के बाद सर्वसम्मति से कॉग्रेस के प्रतिनिधि ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति पद पर बैठाया गया.

कार्यकाल प्रारंभ से अंत तक विवादों से ही घिरा रहा। पप्पू मौर्या

ज्ञानी जैल सिंह का राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल प्रारंभ से अंत तक विवादों से ही घिरा रहा. इन्दिरा गांधी के आदेशों के अनुसार जब सिख अलगाववादियों के मंसूबे नाकाम करने के उद्देश्य से स्वर्ण मंदिर में छुपाए गए हथियार और खालिस्तानी समर्थकों को पकड़ने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया, उस समय ज्ञानी जैल सिंह ही राष्ट्रपति थे. इन्दिरा गांधी की हत्या और उसके विरोध में हुआ सिख नरसंहार भी इन्हीं के काल में हुआ. इसके अलावा भारतीय डाक विधेयक, जिसके अंतर्गत निजी पत्रों के संप्रेषण और आदान प्रदान पर आधिकारिक सेंसरशिप लगाने का प्रावधान लागू किया जा सकता था, जैसे कठोर और अलोकतांत्रिक विधेयक को पास ना करने पर भी ज्ञानी जैल सिंह का राजीव गांधी से मनमुटाव हो गया था. हालांकि इस विधेयक पर अपने विशेषाधिकार पॉकेट वीटो का प्रयोग कर इसे पास ना करने पर इन्हें नागरिकों की बहुत प्रशंसा मिली थी. लेकिन यह भी माना जाता है कि उनके इस कदम ने राजीव गांधी सरकार के पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. राजीव गांधी भारतीय डाक विधेयक जैसा कठोर विधेयक पास करवाना चाहते थे, उनकी इस मंशा ने समाज में उनकी छवि को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया था.

दुर्घटना के दौरान ज्ञानी जैल सिंह का निधन। नरेन्द्र विश्वकर्मा

ज्ञानी जैल सिंह बेहद धार्मिक व्यक्तित्व वाले इंसान थे. राष्ट्रपति पद पर पहुंचने के बाद भी जब कभी भी वह पंजाब के आस-पास होते थे, वह आनंदपुर साहिब जाना नहीं भूलते थे. इसी तरह वह लगातार तीर्थयात्राएं करते रहते थे. 1994 में तख्त श्री केशगड़ साहिब जाते समय उनकी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई. उन्हें पीजीआई चंडीगढ़ इलाज के लिए ले जाया गया, जहां उनकी 25 दिसम्बर 1994 को मृत्यु हो गई. दिल्ली में जहां ज्ञानी जैल सिंह का दाह-संस्कार किया गया उसे एकता स्थल के नाम से जाना जाता है.

ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा, विश्वकर्मा वंश को गर्व है। डॉ जगदीश विश्वकर्मा

ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा देश के पहले विश्वकर्मा वंशज और सिख राष्ट्रपति थे. वह देश और अपने धर्म के लिए प्रतिबद्ध और जनता के हितों की रक्षा करने वाले व्यक्ति थे. उन्होंने अपने कार्यकाल में यह बात प्रमाणित कर दी थी कि जनता और देश का विकास ही उनकी प्राथमिकता है. चाहे अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालना हो या भारतीय डाक विधेयक पास ना करना हो, वह हमेशा अपने निश्चय पर अडिग रहे. भारतीय राजनीति में आज भी उन्हें एक निरपेक्ष और दृढ़ व्यक्तित्व वाले व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है।

ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा जी के वंशज पंजाब में है। अरविन्द विश्वकर्मा

ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा के पुत्र जोगिंदर सिंह विश्वकर्मा, पौत्र इंद्रजीत सिंह विश्वकर्मा है आदरणीय इंद्रजीत सिंह विश्वकर्मा जी में स्वम ज्ञानी जैल सिंह विश्वकर्मा जी की छवि नज़र आती है इंद्रजीत सिंह विश्वकर्मा जी रात दिन विश्वकर्मा वंशजों को किस तरह प्रथम पँगती में लाया जाएं तन मन धन से लगे रहते हैं इंद्रजीत सिंह विश्वकर्मा जी के इन प्रयासों से विश्वकर्मा वंश उनका ऋणी है।

 25 दिसंबर 2022 दिन रविवार को श्री विश्वकर्मा मंदिर आदमपुर जौनपुर में श्री विश्वकर्मा पूजा महासमिति जौनपुर के तत्वाधान में भारत के सातवें राष्ट्रपति विश्वकर्मा समाज के गौरव ज्ञानी जैल सिंह की पुण्यतिथि का कार्यक्रम रखा गया जिसमें मुख्य अतिथि के तौर पर श्यामा वर्ल्ड स्कूल के प्रधानाचार्य इंद्रजीत विश्वकर्मा अध्यक्षता अरविंद विश्वकर्मा और समापन द्वारा किया गया संस्था द्वारा मुख्य अतिथि महोदय को सम्मान पत्र दिया गया
उपस्थित विश्वकर्मा बंधु संस्था के अध्यक्ष उमाकांत विश्वकर्मा, कन्हैया लाल विश्वकर्मा ,अजय विश्वकर्मा,अशोक, बंसराज विश्वकर्मा ,अमरेंद्र , नरेंद्र ,राधेश्याम, डॉक्टर जगदीश विश्वकर्मा ,एडवोकेट बिरेंदर विश्वकर्मा, सत्यनारायण विश्वकर्मा ,मुन्ना लाल विश्वकर्मा ,दीपक आर विश्वकर्मा ,दिनेश विश्वकर्मा, दिलीप विश्वकर्मा, प्रेमचन्द, बच्चूलाल, महेश , आकाश  गुलजीत विश्वकर्मा गप्पू मौर्य प्रधान राजेश गौतम, प्रदेश सचिव हाजी बंधु आदि  उपस्थित रहे

🚩🙏ॐ नमो विश्वकर्मणे

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