राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक पूर्वांचल से ही क्या एक बार फिर निकलेगा यूपी की सत्ता का रास्ता

अयोध्या।(राजेश श्रीवास्तव ब्यूरो चीफ अयोध्या) राजनैतिक विशेषज्ञों की बात माने तो चुनाव कोई भी उसका रास्ता उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल से ही होकर गुजरता है,चाहे वो राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का हो चाहे सूबे की राजधानी लखनऊ का हो।सूत्र के मुताबिक दोनों की दिशा और दशा पूर्वांचल तय करता है।अगर देखा जाये तो वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने यहां 10 जिलों में 61 में से 39 सीटें हासिल कर बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती सरकार को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा  दिया था।वही ठीक असर सपा मुखिया अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार का 2017 के चुनाव में भी यही हाल हुआ था।भारतीय जनता पार्टी ने इसे समाजवादी पार्टी को महज 12 सीटों पर समेट दिया और अकेले 34 सीटों पर जीत का परचम लहराते हुए कब्जा किया।क्या इस बार भी बाजी वो मारेगा जो पूर्वांचल का गढ़ जीतेगा।आइए जानते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़े किस तरफ इशारा कर रहे हैं और अखिलेश-राजभर के गठबंधन के बाद क्या हालत पैदा होंगे।समाजवादी पार्टी की तत्कालीन सहयोगी कांग्रेस जिसने 2012 में तीन सीट ही जीत पाई थीं और 2017 में शून्य हो गई थी।वही चुनाव से पहले सीएम पद के उम्मीदवार को पेश नहीं करने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक दबदबे पर 325 सीटों के तीन-चौथाई बहुमत से 2017 का चुनाव जीता था।हालांकि सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने 2012 में अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री के रूप में नामित किया था।वही चुनाव आयोग के रिकॉर्ड इस क्षेत्र के सत्ता पैटर्न को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के काशी क्षेत्र के  10 जिलों में 61 सीटें हैं।इनमें वाराणसी 8, आजमगढ़ 10,बलिया 7, जौनपुर 9, मऊ 4, गाजीपुर 7,चंदौली 8, मिर्जापुर 5, सोनभद्र 4 और भदोही 3 सीटें शामिल हैं।समाजवादी पार्टी ने 2012 में 39 सीटों पर जीत हासिल की थीं तो वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में मऊ, वाराणसी, भदोही, सोनभद्र और मिर्जापुर सहित कई जिलों में पूरी तरह से सफाया हो गया था,जबकि इसकी सीटों में इसके गढ़ आजमगढ़ सहित अन्य जिलों में भारी कमी आई थी,जहां इसे नौ से पांच सीटों तक प्रतिबंधित किया गया था। समाजवादी पार्टी को बलिया, जौनपुर, और गाजीपुर में चार सीटों का नुकसान हुआ है।बहुजन समाज पार्टी ने 2012 में आठ सीटों पर जीत हासिल की थीं तो वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में अपनी संख्या बढ़ाने में नाकाम रही। बहुजन समाजवादी पार्टी केवल सात सीट ही पाई।कांग्रेस की हालत खस्ताहाल रही। कांग्रेस ने 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था।कांग्रेस गठबंधन करने के बाद भी पाई के एक बड़े हिस्से को खाकर 2012 में जीती हुई अपनी तीन सीटों को खो दिया।भारतीय जनता पार्टी ने अपना दल गठबंधन के साथ चार सीटें जोड़ते हुए अपनी संख्या पांच से बढ़ाते हुए 34 कर ली।इसके अलावा उसके पूर्व सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने भी तीन सीटें जीती थीं,हालांकि एसबीएसपी 2022 के चुनाव में भगवा खेमे को बाय बाय कर साइकिल वाले खेमे में शामिल हो गई है।

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