अयोध्या।(राजेश श्रीवास्तव ब्यूरो चीफ अयोध्या)
लोकतांत्रिक व्यवस्था में देश के सभी सर्वोच्च पदों को राष्ट्र की धरोहर मानकर उनकी सुरक्षा एवं मान सम्मान सुनिश्चित करने का दायित्व कार्यपालिका को सौंपा गया है और विरोध करने का भी अधिकार नागरिकों को दिया गया है। जब देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री चलता है तो उसके साथ संवैधानिक प्रोटोकॉल चलता है।जब देश के सम्माननीय गुजरते हैं तो उन्हें राष्ट्र का मुखिया मानकर बिना राजनैतिक भेदभाव के सुरक्षा एवं मान सम्मान प्रदान किया जाता है।इन्हें राष्ट्रीय प्रतीक मानकर ही इन्हें देश की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसियां उपलब्ध कराई जाती हैं और सुरक्षा चक्र प्रदान किया जाता है।देश के राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के साथ उनका काफिला चलता है और उनके दौरे के दोहरे तिहरे प्लान तैयार किये जाते हैं ताकि कोई बाधा उत्पन्न न हो सके।लोकतंत्र में राजनीति के दायरे हैं जिसके अंदर रहकर वोट का खेल खेलने की छूट राज नेताओं को दी गई है।वोट के लिए राष्ट्रीय पद वाले सम्मानीय के रास्ते में अवरोध उत्पन्न करना कतई उचित एवं लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता है।सभी जानते हैं कि किसानों के नाम पर पिछले साल से शुरू सालों चले किसान आंदोलन में पंजाब की महती भूमिका थी शायद इसीलिए राजनैतिक लाभ के दृष्टिगत कांग्रेस की सरकार ने किसानों को मनमानी करने से रोका नहीं बल्कि उन्हें सुविधाएं उपलब्ध कराकर बढ़ावा एवं संरक्षण दिया था क्योंकि पंजाब सरकार किसानों के आंदोलन का एलानिया समर्थन कर राजनैतिक रोटियां सेंकना चाहती है।किसानों के नाम पर एक बार कलंक तब लगा था जबकि पिछले साल राष्ट्रीय पर्व पर राष्ट्रीय धरोहर को लज्जित किया गया था दूबारा कल पंजाब में हुआ जबकि किसानों के नाम पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आकस्मिक जमीनी दौरे से एक कार्यक्रम में जा रहे थे।संवैधानिक दायित्व के नाते पंजाब सरकार का कर्तव्य था कि वह देश आला की यात्रा को निस्कंटक बनाकर सकुशल अपने राज्य से वापस भेजती।किसानों की प्रमुख समस्याओं निदान हो गया है और कुछ समस्याओं के समाधान के लिए कमेटी ही नहीं बल्कि विज्ञान भवन में सीधे वार्ता भी होने जा रही है।इसके बावजूद किसान आंदोलन के नाम पर प्रधानमंत्री के रास्ते को अवरुद्ध करना संवैधानिक अधिकारों का दुरपयोग करने जैसा है।भले ही कहा जा रहा हो कि तथाकथित किसान अचानक रास्ते में आकर मार्ग अवरुद्ध कर दिया हो लेकिन सवाल तो यह है कि जब प्रधानमंत्री का सड़क मार्ग से जाने का फैसला अचानक मौसम को देखते हुये हेलीकॉप्टर की जगह कार से किया गया तो इस बदलाव की जानकारी तथाकथित किसानों को कैसे मिल गई और प्रधानमंत्री के गुजरने वाले चाकचौबंद सुरक्षा वाले रास्ते में कैसे आ गए? शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रधानमंत्री के गुजरने वाले मार्ग में बाधा उत्पन्न हुयी है वरना देश के हर राज्यों में सुरक्षा में राजनीति नहीं नहीं बल्कि संवैधानिक उत्तरदायित्वों का किया जाता है।हम किसानों का विरोध नहीं बल्कि उनका विरोध जरूर करते हैं जो किसानों का राजनैतिक इशारे पर इस्तेमाल कर अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति करते हैं।प्रधानमंत्री की सुरक्षा में हुयी चूक एवं उनकी टिप्पणी के बाद जबाब संवैधानिक नहीं बल्कि राजनैतिक आधार पर आने लगे हैं और मीडिया पर बहस छिड़ गई है।भाजपा जहाँ इसे गैर जिम्मेदाराना राजनैतिक महत्वाकांक्षा से परिपूर्ण साजिश मानती है तो सत्तारूढ़ कांग्रेस इसे बकवास और प्रदेश में प्रधानमंत्री के प्रति पैदा आक्रोश मान कर प्रस्तावित रैली की विफलता को छिपाने की साजिश करार देकर संवैधानिक जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर रही है।सवाल यह है कि जब मार्ग बाधित था तो सुरक्षा प्रमुख डीजीपी ने कैसे कह दिया कि रूट ओके है? ऐसा तो नहीं राजनैतिक महत्वाकांक्षा के लिये कुछ लोगों को रास्ते में खड़ा कर दिया गया हो?

