19 मई – श्रीरामचरितमानस की भाव सहित चौपाई
नमो राघवाय 🙏
हित हमार सियपति सेवकाईं ।
सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाईं ।।
मैं अनुमानि दीख मन माहीं ।
आन उपायँ मोर हित नाहीं ।।
( अयोध्याकाण्ड 177/1)
राम राम 🙏🙏
दशरथ जी के परलोक गमन पर भरत जी को ननिहाल से बुलाया गया है । पिता जी की सब बिधि क्रिया की गई है । कुछ दिन बाद वशिष्ठ ने राज सभा बुलाकर भरत जी को अयोध्या का राज सम्हालने को कहा है । भरत जी कहते हैं कि पिताजी स्वर्ग में और राम जी वन में हैं ऐसे में मुझे राज करने को कहकर आप लोग अपना काम बनाना चाहते हैं । मेरा हित तो राम सेवा में है परंतु उसे माता की कुटिलता ने छीन लिया । मैंने विचार कर पाया कि राम सेवा छोड़ दूसरे उपाय से मेरा कल्याण नहीं है ।
भरत जी ने विचार कर राम सेवा में ही अपना हित माना है परंतु हम आप तो सेवा लेने में अपना हित मानते हैं , परंतु जो राम सेवा में लग जाता है उसके हित की रक्षा तो राम जी स्वयं करते हैं । अत: राम सेवा में लगें । अथ ! श्रीराम जय राम जय जय राम 🚩🚩🚩
संकलन तरूण जी लखनऊ

