गीता प्रवचन स्वाध्याय का 84वाँ सप्ताह सफलतापूर्वक सम्पन्न : अमित परमार

गीता प्रवचन स्वाध्याय का 84वाँ सप्ताह सफलतापूर्वक सम्पन्न : अमित परमार

 

गीता प्रवचन स्वाध्याय का 84वाँ सप्ताह ऑनलाइन माध्यम से सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस सत्र में गीता अध्याय 14 के अंतर्गत “सत्त्वगुण और उसका उपाय” विषय पर चिंतन किया गया। श्री अमित परमार द्वारा विषय का प्रवेश कराया गया। उन्होंने बताया कि सत्त्वगुण मनुष्य के जीवन में प्रकाश, शुद्धता और सदाचार का आधार है, परंतु इसके साथ सावधानी भी आवश्यक है, क्योंकि सत्त्वगुण का अभिमान और आसक्ति मनुष्य को आध्यात्मिक प्रगति से दूर कर सकते हैं। इसलिए सत्त्वगुण का उपयोग जीवन को शुद्ध बनाने के लिए करना चाहिए, न कि उसके प्रति अहंकार या आसक्ति विकसित करनी चाहिए।

 

30 मिनट के इस साप्ताहिक स्वाध्याय में ब्रह्म विद्या मंदिर पवनार से आदरणीय ज्योत्सना दीदी तथा स्वाध्याय परिवार से आदरणीय चतुरा दीदी जी द्वारा विचार प्रस्तुत किए गए। इस अवसर पर चतुरा दीदी ने विषय का सरल और गहन विवेचन प्रस्तुत किया।

 

कार्यक्रम का शुभारंभ ब्रह्म विद्या मंदिर, पवनार से आदरणीय ज्योत्सना दीदी द्वारा मंगलाचरण के साथ किया गया। उन्होंने बताया कि सत्त्वगुण अत्यंत उपयोगी और प्रकाश देने वाला गुण है, परंतु इसके साथ सावधानी आवश्यक है। मनुष्य को रजोगुण और तमोगुण को दूर करने का प्रयास करना चाहिए, पर सत्त्वगुण को नष्ट नहीं करना चाहिए। बल्कि उसे सही दिशा में उपयोग करते हुए उसके प्रति अभिमान और आसक्ति से बचना चाहिए।सत्त्वगुण अत्यंत सूक्ष्म और उपयोगी गुण है, इसलिए उसके साथ बहुत सावधानी से व्यवहार करना चाहिए। रजोगुण और तमोगुण का पूर्णतः नाश करना आवश्यक है, परंतु सत्त्वगुण को नष्ट नहीं करना चाहिए, बल्कि केवल उसके प्रभाव को नियंत्रित करना चाहिए। सत्त्वगुण मनुष्य के जीवन में प्रकाश और शुद्धता लाता है, इसलिए उसका उपयोग सही दिशा में होना चाहिए।

 

इसके पश्चात स्वाध्याय परिवार से आदरणीय चतुरा दीदी जी ने विषय को आगे बढ़ाते हुए बताया कि सत्त्वगुण का सबसे बड़ा दोष उसका अभिमान है। जब मनुष्य को अपने सद्गुणों पर गर्व होने लगता है, तब वही गुण उसकी आध्यात्मिक उन्नति में बाधा बन जाते हैं। इसलिए सद्गुणों को स्वाभाविक बनाना चाहिए, जैसे सूर्य बिना किसी अभिमान के प्रकाश देता है और सांस लेना भी मनुष्य की स्वाभाविक क्रिया है।जैसे लालटेन के काँच पर जमी कालिख प्रकाश को बाहर आने से रोकती है, उसी प्रकार अहंकार और तमोगुण आत्मा के प्रकाश को ढक लेते हैं। इसलिए मनुष्य को इन दोषों को हटाकर अपने भीतर की शुद्धता को बनाए रखना चाहिए।

 

उन्होंने आगे बताया कि सत्त्वगुण से अभिमान के साथ-साथ उसकी आसक्ति को भी छोड़ना आवश्यक है। अभिमान और आसक्ति अलग-अलग होते हैं। कई बार अभिमान समाप्त हो जाता है, परंतु आसक्ति बनी रहती है। इसलिए सत्त्वगुण का उपयोग लोककल्याण और आत्मशुद्धि के लिए करना चाहिए, पर उससे बंधना नहीं चाहिए। संत पुरुष इसी कारण सत्त्वगुण के आधार पर समाज का मार्गदर्शन करते हैं, परंतु वे स्वयं उससे आसक्त नहीं होते।

 

समापन में आदरणीय रमेश भैया जी तथा डॉ. सुरेश गर्ग जी ने यह संदेश दिया गया कि पहले मनुष्य को अहंकार पर विजय प्राप्त करनी चाहिए और फिर आसक्ति का त्याग करना चाहिए। सत्त्वगुण से प्राप्त होने वाले फल—जैसे यश, सफलता या सुख—को भी ईश्वर को अर्पित कर देना चाहिए। जब मनुष्य निष्काम भाव से कर्म करता है और फल की अपेक्षा छोड़ देता है, तब वह सच्चे अर्थों में सत्त्वगुण पर विजय प्राप्त कर लेता है।

इस अवसर पर प्रोफेसर देवराज सिंह जी ने भी अपने विचार रखते हुए गीता स्वाध्याय की इस श्रृंखला को निरंतर और सतत रूप से चलते रहने की कामना व्यक्त की तथा इसे समाज के लिए अत्यंत उपयोगी पहल बताया।

अंत में अमित परमार ने कार्यक्रम में जुड़े सभी को स्वाध्याय परिवार में नियमित रूप से जुड़ने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।

यह साप्ताहिक स्वाध्याय प्रत्येक रविवार सायं 6:15 से 6:45 बजे ऑनलाइन आयोजित होता है। स्वाध्याय से जुड़ने के इच्छुक व्यक्ति मोबाइल नंबर 9670511153 अथवा ईमेल amitparmar47@gmail.com के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।

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