ज्ञान सम कोई नेत्र नहीं
ध्रुव-1
एक घटना प्रसंग दिवंगत शासन श्री मुनि श्री पृथ्वीराज जी स्वामी ( श्री ड़ुंगरगढ़ ) मेरे को सदैव कहते थे कि प्रदीप सदैव जीवन में झुककर चलना और विनम्रता आदि को शिरोधार्य करना व ज्ञान प्राप्ति की सदैव ललक रखना और अपना स्वभाव अभी जैसे अच्छा रखना और अच्छा का प्रयास करते रहना आदि – आदि क्योंकि जीवन में ज्ञान ही आदमी के आचरण को झलकाता है जो तेरे व्यवहार से स्पष्ट परिलक्षित होता है । यह अच्छी प्रकृति तेरे को जीवन में आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करती रहे व लेखन के कार्य को सही से आगे बढ़ करते रहना जिससे उचित लक्ष्य ( जो मुनि श्री द्वारा इंगित) तुझे प्राप्त होते रहे । मुनिवर तो अभी नहीं रहे लेकिन उनकी दी हुई शिक्षा मुझे सदैव आगे बढ़ने को सही से प्रोत्साहित करती रहती है । कहते है कि अपने ज्ञान से विवेक को जिसने हमसाथी बना लिया उसने सही से अपना जीवन सुखी बना लिया है । वह सभी पहलुओं को जानकर स्वयं को समझा लिया उसने सत्यांश कहकर कर्मों से स्वयं को बचा लिया है । वह किसी अपने का दिल नहीं तोड़ा है वह जीवन के जीने का मकसद सुखद् पा लिया है । सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र रूपी त्रिवेणी ही स्वर्ग है और इसके विपरीत मिथ्यादर्शन,मिथ्या ज्ञान और कथनी करनी की एकरूपता आदि न होना ही नरक है। हमारी कथनी और करनी एक जैसी हो । हमारी सभी प्रवृतियां सही से शुद्ध भावकिर्यापूर्वक हो,स्वर्ग यही है और इसके विपरीत अशुभ प्रवृति मन,वचन और काया की नरक रूप है,दुःखदाई होती है। वह जीवन उसका स्वर्ग से कम नहीं जिसके मन में ज्ञानार्जन की
क्रमशः आगे
प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ )

