*प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पर ड्राॅप मोर क्राप) से टपक सिंचाई संयत्र का लाभ उठायें गन्ना किसान*
*ड्रिप सिंचाई से 50 प्रतिशत पानी की बचत व उत्पादन में 20-25 प्रतिशत की होगी वृद्धि*
*पौधों की जड़ों में सीधा पानी पहुंचने से खरपतवार की समस्या में होगी कमी*
*वर्ष 2025-26 के अन्तर्गत 25000 हेक्टेयर गन्ना क्षेत्रफल का लक्ष्य आवंटित*
*लघु एवं सीमान्त गन्ना कृषकों को लागत का 90 प्रतिशत व अन्य किसानों को 80 प्रतिशत अनुदान*
*ड्रिप सिंचाई से क्षारयुक्त भूमि व असमतल भूमि वाले क्षेत्रों में भी गन्ना खेती संभव*
जौनपुर 01 जुलाई, 2025 (सू0वि0)- जिला गन्ना अधिकारी द्वारा बताया गया कि प्रदेश के आयुक्त, गन्ना एवं चीनी प्रमोद कुमार उपाध्याय द्वारा लघु व सीमान्त एवं अन्य गन्ना कृषकों के हित के दृष्टिगत प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना श्पर ड्रप मोर क्रापश् (माइक्रोइरिगेशन) को गन्ना खेती में लागू कर उत्पादकता में वृद्धि के सार्थक प्रयास किये जा रहे हैं, जिससे गन्ना उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ जल संरक्षण/पानी की बचत के क्षेत्र में दीर्घकालिक लाभ किसानों को मिल सके। इस संबन्ध में सभी गन्ना उत्पादक जिलों का लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया है। वर्ष 2025-26 के लिए 25000 हेक्टेयर का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिससे लगभग 20-25 हजार गन्ना किसान लाभान्वित होंगे। गन्ना विकास विभाग द्वारा वर्ष 2025-26 में प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना श्पर ड्रप मोर क्राप (माइक्रोइरिगेशन) योजना के अन्तर्गत आर्थिक रूप से पिछड़े लघु एवं सीमान्त कृषकों हेतु 90 प्रतिशत अनुदान दर पर 5000 हेक्टेयर एवं अन्य श्रेणी के कृषकों हेतु 80 प्रतिशत अनुदान दर पर 20000 हेक्टेयर अर्थात गन्ने से आच्छादित जिलों हेतु कुल 25000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में गन्ने की फसल हेतु लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
जिला गन्ना अधिकारी ने बताया कि दिन प्रतिदिन जल स्तर में हो रही कमी में सुधार हेतु गन्ना आयुक्त, महोदय द्वारा ड्रिप इरीगेशन द्वारा गन्ने की खेती करने पर बल दिया गया है। गन्ना उत्पादकता में वृद्धि के दृष्टिगत पारम्परिक सिंचाई विधियों की तुलना में ड्रिप सिंचाई प्रणाली बहुत प्रभावी तकनीक है। ड्रिप सिंचाई में पानी और पोषक तत्वों का सही मात्रा में सही समय पर इस्तेमाल होता है, इससे पानी की बचत होती है और गन्ना उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ जल व ऊर्जा की बचत होती है एवं खेत में खरपतवार में कमी आती है तथा पौधों का विकास बेहतर होता है।

