*भारतीय जीवन मूल्यों की नव प्रस्तुति अ-मोक्ष: एक प्रस्तुति* -डाक्टर रघुनंदन झा
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*अ-मोक्षवाद*
मोक्ष एक प्रसिद्ध शब्द है जिसे चतुर्थ पुरुषार्थ कहा जाता है.भारतीय संस्कृति और दर्शन में लगभग हर विचारधारा इसका समर्थन और विवेचन करती है.आस्तिक के साथ सभी नास्तिक दर्शन भी विभिन्न नामों और रूपों में इसको अपना सर्वोच्च लक्ष्य बनाते हैं और इसके लिए साधना करते हैं.मोक्ष,मुक्ति,कैवल्य,निर्वाण, अपवर्ग,ब्रह्मनिर्वाण,परम गति,परम धाम और परम शांति सब लगभग समानार्थी पद हैं.यह सर्वबंधन और सर्वदुख की आत्यंतिक निवृत्ति की अवधारणा और स्थिति है.इसका विपरीत पद बंधन है जो मनुष्य की चेतना को अज्ञान से आच्छादित कर उसे दुख और मृत्यु की नियति से जकड़ता है.हमारी योगसाधना बंधन से मोक्ष की यात्रा है.श्री शिव शंकर द्विवेदी,संयुक्त सचिव सेवानिवृत्त उत्तर प्रदेश शासन, मोक्ष की भारतीय अवधारणा से सहमत नहीं हैं.उन्होंने इस कारण अपने अभिनव विचार दर्शन और अनुभूति को अ-मोक्ष की संज्ञा दी है और उसे विस्तार से अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अ-मोक्ष : एक प्रस्तुति’ में वर्णित किया है.उनका अ-मोक्ष न बंधन है और न मोक्ष.वह दोनों से अलग और विशिष्ट है.यह दर्शन मौलिकता और अपूर्वता के साथ अनुभूतिपरक और यथार्थवादी है.उनकी दृष्टि में मनुष्य एक ठोस अस्तित्व है और वह ब्रह्म का आदि संकल्प है.ब्रह्म ने एक से बहु होने का आद्य संकल्प लिया, उससे इस अनंत सृष्टि और जीवन का अद्भुत और भव्य उद्भव और बहुरंगी विस्तार हुआ.ऐसा कभी नहीं था जब सृष्टि औऱ जीवन व्यक्त अथवा बीज रूप में उपस्थित नहीं था और ऐसा कभी नहीं होगा,जब सृष्टि और जीवन का उमड़ता अनंत समुद्र सूख जाय.इस सृष्टि में जीवन का उत्सव यूं ही होता रहेगा.श्री द्विवेदी प्रकृति के लहराते परिवर्तनों के बीच जीवन की शाश्वतता का जयघोष करते हैं. वे अपनी वैचारिकी के केंद्र में जीवन की सर्वोच्चता को रखते हैं.जीवन है तो सब है जीवन नहीं तो सब अंधकार में लिपट जाता है.श्री द्विवेदी ने इसके लिए वेद,उपनिषद, गीता,तर्क,प्रत्यक्षवाद,न्याय और वैयक्तिक अनुभूति को अपना आधार बनाया है.उनका सारा ग्रंथ-प्रबंध पूर्णता,लय और सौंदर्य लिए हुए है.प्रश्न उठता है कि वे अपनी इस नव्य स्थापना से क्या संदेश देना चाहते हैं?इसमें उन्होंने जीवन की अविच्छिन्न गत्यात्मकता का रंग बिखेरा है.मनुष्य जैसा भी है उसके जीवन के महत्व और मूल्य का क्षरण नहीं हो सकता.उसे अपने जीवन की लौ को सदा जलाये रखना है.उसे मोक्ष के निवृत्तिवादी रथ से पलायन नहीं कर जाना है.मनुष्य का जीवन से भागना उसकी दुर्बलता है.जीवन अपनी संरचना,अभिव्यक्ति और क्रिया में जो भी फल लाता है,हमें उसका आनंद लेना है और जीने की सक्षमता को बढ़ाते जाना है.मोक्ष की वृत्ति जीवन और जगत के सृजन-तप और प्रासंगिकता का शुद्ध तिरस्कार है.हमें प्रवृत्तिमार्ग से जीवन को सकारात्मक और सृजनात्मक बनाना है.ऐसा नहीं है कि यह दर्शन जीवन मूल्यों को निगल जाता है.यह गीता के नियत कर्म को जीवन का प्रेरणा-गीत बनाता है.श्री द्विवेदी की दृष्टि में शरणागति की निष्क्रिय साधना से नियत कर्म की सक्रिय साधना अधिक सार्थक और परिणामदात्री है.वे अव्यवहारिक आध्यात्मिक अवधारणाओं से अलग रहकर व्यवहारक्षम सिद्धांतों को जीवन में लेते हैं और उनका प्रयोग सुनिश्चित करते हैं.उनका दर्शन जीवन को सर्वोच्च आदर देता है और वे उसका विजय-गीत रचते और गाते हैं।
-पूर्व पशुधन प्रसार अधिकारी
सम्प्रति श्री अरविंद अध्ययन केंद्र,लखीमपुर-खीरी से सम्बद्धता
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