रहें प्रकृति के साथ :प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ )
ध्रुव-2
चाहे अपना भण्डार लेकर भर ले। प्रकृति का हर अंश कुछ न कुछ संवाद मनुष्य के लिये लिये हुये है । हम सूरज की ही बात करें । हमको हर शाम को अस्त होता सूरज यह सौग़ात देता है कि हे मानव ! हर किसी का सूरज सदा चमकता ही नहीं रहता है । वह हर किसी के जीवन में कभी न कभी एक ऐसा दौर आता ही आता है जब वह अस्त होता ही होता है पर हर भोर का सूरज जब उदित होता है तो अपनी सुनहरी लालिमा लिए तब बड़े गर्व से कहता है कि हे मानव! जो भी ऊँचाईयों से गिरा है वह गिरा ही नहीं रहता है । वह कभी न कभी पुनः उठ कर ऊँचाईयॉं को छू सकता है । यह उत्थान, पतन की प्रक्रिया तो जीवन की स्वाभाविकता है। अत: हमको इन्हें स्वाभाविक रूप में ही लेना चाहिए। वह हमको अपने जीवन के उत्थान में न अति प्रसन्न व पतन में अधिक अवसाद नहीं होना चाहिए। यह सब तभी हो सकता है जब हम उसके साथ नित कुछ समय व्यतीत करें। हम यदि हम शहर में हैं और जहाँ जगह की तंगी है तो घर पर ही कुछ पौध लगा लें। वह उनकी देखभाल करें। वह इन
नन्हें पौधों को रोज बढ़ता देख न केवल हमारे मन को शांति मिलेगी बल्कि आत्मा को भी ऊर्जा मिलेगी। अतः हम प्रकृति के साथ रहेंगे तो हमको जीवन जीने की और ही बात होगी ।

