विषय आमंत्रित रचना – इच्छाएँ………
ध्रुव-2
ली। अब बिल्ली म्याऊँ म्याऊँ करने लगी तब लगा इसको तो पीने के लिए दूध चाहिये , तब गाय की चाह पैदा हुयी। भक्त ने गाय ला दी। अब गाय दुहने वाली चाहिये , तो बाबा ने शादी कर ली ।परिवार बढ़ा। एक बार पुराने भक्तों की टोली बाबा के दर्शन करने पहुँची। वहाँ खेल रहे बच्चों से पूछा – यहाँ बहुत पहले एक अकेले बाबा रहते थे वो कहाँ है ? इतने में बाबा आये कहा- मैं ही वो बाबा हूँ पर सिर्फ़ एक चाह ने केवल आश्रम की जगह गृहस्थ आश्रम बना दिया। अत: यही शिक्षा जीवन में उतारनी चाहिये कि छोटी सी चाह भी बहुत बड़ा संसार बढ़ा देती है। इच्छाएँ आकाश के समान अनंत होती है जैसे आकाश अंतहीन होता है वैसे ही इच्छाओं का भी अंत नही होता है । इच्छाएँ बढ़ – बढ़ कर जितनी आँनलाइन होती जा रही है ,सुख की नींद उतनी ही ज़्यादा – ज़्यादा आँफलाइन होती जा रही है । एक कहावत सुनी थी कि जिसके पास दांत है उसके पास चने नही और जिसके पास चने है उसके पास दांत नही है अर्थात जिसके पास पैसा तो है उसके पास करने को साथ में काम नही है और जिसके पास करने को काम है उसके पास साथ में पैसा नही और जिसके पास काम और पैसा दोनो है लेकिन काम सही से करने का तरीका नही है आदि – आदि ।
विषय आमंत्रित रचना – इच्छाएँ……… भव्य संकलेचा – सूरत – ( गुजरात)।
क्रमशः आगे
प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़)

