*माँ गंगा का निर्मल धारा निरन्तर बहती रहनी चाहिए*
(प्रोफे० जी०सी० पाण्डेय (अवकाश प्राप्त) उ०प्र० सरकार द्वारा, सरस्वती सम्मान प्राप्त, पर्यावरणविद्, अयोध्या)
माँ गंगा की निर्मल धारा मुझे एहसास कराती है कि इससे पवित्र कोई अन्य जल नहीं होता है। इस जल के स्पर्श मात्र से प्रत्येक वस्तु को शुद्ध करने की शक्ति होता है। गंगा जल का महत्व अनादिकाल से है। यह अपनी उद्गम स्थान से नीचे आने तक कई दुर्लभ जड़ी, बूटी वाले रास्तों से होकर गुजरती है। बुटियों के मिश्रण से जल लगातार पवित्र बना रहता है क्योंकि इनमें दूषित वैक्टीरिया पनपते ही मर जाते हैं। गंगा स्वर्ग के समान सुखदायिनी हैं, इसलिए इसके आचमन, गंगा में स्नान और स्पर्श मात्र से स्वर्ग की अनुभूति होती है।
देश के दो स्थानों प्रयागराज एवं हरिद्वार में अमृत की बूंदे समयकाल में, गिरने के कारण अमृत तुल्य एवं स्वर्ग की नदी भी माना गया है। विभिन्न शोधों / रिपोटों के माध्यम से मिल चुका है कि इसका जल कभी दूषित नहीं होता है। माँ गंगा, वातावरणीय ऑक्सीजन सोखने की अद्भुत क्षमता रखती हैं तथा अन्य नदियों की अपेक्षा गन्दगी को नष्ट करने की क्षमता रखती है। यह हमेशा शुद्ध रहता हैं क्योंकि इसमें कीड़े/ अन्य जीव नहीं पाये जाते जिससे गन्दा महकती नहीं और शुद्ध रहती है, जब कि अन्य नदियाँ/कूप का जल जल्द ही दूषित हो जाता है।
डॉ० कामत द्वारा प्रेषित एक रोचक वैज्ञानिक रिपोर्ट जिसमें उन्होंनें इलाहाबाद में कुम्भ मेला दौरान गंगा जल का सूक्ष्म वैज्ञानिक दृष्टिकोण द्व ारा अध्ययन कर, अपना रिपोर्ट प्रस्तुत किया।
डॉ० कामत ने एक व्यक्ति को निर्जीव बोतलों के साथ, पाँच अलग-अलग स्थानों (नदी के किनारे, थोडे अन्दर जाकर, दूसरे किनारे से,नदी के मध्य भाग में और जहाँ सबसे ज्यादा लोग स्नान कर रहे थे) उक्त पाँचों नमूनों में एक सेट वैक्टीरियोंलाजिकल अध्ययन के लिए प्रयोगशाला में भेजा तथा दूसरा सेट हाफकिन से संस्थान को वैक्टीरियालोजी एवं बायारोलाजी के लिए, परीक्षण के लिए दिया। अध्ययन में पता चला जो कि परिणाम निश्चित तौर चौकाने वाले थे, उक्त दोनों प्रयोगशाला में भेजे गए पाँचों नमूनो में जीवाणु (बैक्टीरिया) नहीं पाया गया लेकिन उन नमूनों में बड़ी मात्रा में बैक्टीरियोफेज (Bactriophages) पाए गए। बैक्टीरिया फेज ऐसे वायरस है, जो मौजूद बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है। इसलिए गंगाजल में संक्रमण फैलाने वाले बैक्टीरिया पनप नहीं सकते क्योंकि उन्हें नष्ट करने वाले वैक्टीरियोफेज बड़ी मात्रा में उपस्थित रहते है। इसी कारण करोड़ों लोग गंगा स्नान करने के बावजूद भी कुम्भ मेले में महामारी नहीं फैली। यह एक चमत्कारी वैज्ञानिक सत्य है। इसलिए कहा गया है कि “गंगा की सफाई मत कीजिए वह स्वयंसफाई कर लेगी”।
गंगा जल का पानी प्लास्टिक के बर्तनों में नहीं रखना चाहिए। इसको पीतल, कांसा, तांबा, चांदी के बर्तनों में रखना चाहिए, जिससे पवित्र जल की गुणवत्ता बनी रहती है।
गंगाजल निर्मल है परन्तु आज गंगा को प्रदूषित कौन बना रहा है? इसकी समस्या / समाधान हम स्वयं है। हम हर स्तर पर जिम्मेदार है। इस संदर्भ में कुछ निम्न तथ्य है-
– वैक्टीरियोफेजस (अन्टी वैक्टीरिया वायरस) इ० कोलाई वायरस को नष्ट करने के साथ-साथ किसी वैक्टीरियों का प्रभाव नहीं होने देता है जो भी आर्गेनिक मैटेयिरल गंगा जल में होते है उसको कुछ प्रोटोजोवा एवं फंगस धीरे-धीरे समाप्त कर देते है।
-सायनोवैक्टीरिया एक अलगी है जो जलीय जीवन को बढ़ाने में सहायता करता है और यह ऑक्सीजन पैदा कर जलीय व्यवस्था का सहायक होता है।
–पानी में लगभग 80 प्रतिशत कैटायन्स एवं एनायन्स होते है-Ca+mg, H₂CO₂ के होते है। जिसमें pH लगभग 8.23-8.76 होता है। ई. कालाई की संख्या लगभग 92000/MPN/100ml पाया जाता है। जबकि CBCB के अनुसार 5000/MPN/100ml, बताया गया है। – आम आदमी की धारणा है कि किसी भी नदी का प्रदूषित होना निम्न कारणों से है:-
*राख नदी में, इलेक्ट्रोप्लेटिंग फैक्टरी से या अन्य जगहों से आने के कारण।
*DTP, STP BTP, सही सिवेज मैनेजमेन्ट का न होना। सिवेज का डाइवर्जन न होना।
*सिलटिंग का सफाई न होना। *गन्दगी को सफाई करने वाले जीवों का न होना।
*नदी में कपड़ा धोना।
*लकड़ी से लाश जलाकर, लाश एवं अद्यजले लकड़ी पानी में डालना।
*मरे जानवर को डालना।
*धार्मिक आयोजन पर मूर्तियाँ एवं अन्य पूजा सामग्री डालना। *गारबेज नलियों द्वारा या अन्य माध्यमों से नदी में आना।
*नदियों का किनारा पक्का न होकर, कच्चा होना। पानी की गहराई हमेशा न होना, आदि।
विकसित एवं समृद्ध भारत के लिए गंगा जल का स्वच्छ होना आवश्यक है।
विशेष आग्रह — यह लेख जनमानस की जागरूकता के लिए प्रकाशित किया गया है। जहां तक हो सके नदियों को स्वच्छ बनाने रखने में राष्ट्र हित के दृश्यगत अपना योगदान करने का प्रयास करना होगा, क्योंकि अगर स्वच्छ जल है तो स्वस्थ जीवन है।

