तेरापंथ संघ के दशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का 16 वां महाप्रयाण दिवस
आचार्य श्री महाप्रज्ञ के 16 वें महाप्रयाण दिवस पर मेरी सभक्ति श्रद्धासिक्त भावांजलि ।
समता , करुणा , ममता की अदभुत कृति थे ।
प्रवचन शैली ज्ञान से परिपूर्ण सबको आकर्षित करती थी ।
दशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी सबके मनभावन थे ।
तप पावन तीर्थं तप से कल्मष धूल जाते हैं ।
तप सुर नर तिर्यंच आदि सबको पार लगाता हैं ।
तप से अनुराग बढ़ता तप ही तारणहार हैं ।
तप की पतवार करती भव सागर से पार हैं ।
तप शिवपुर का द्वार हैं तप से होती जय जयकार हैं ।
जन्म पूर्ण समाधिमय था ।
मरण पूर्ण समाधिमय था ।
आधि – व्याधि उपाधि में भी ।
सन्तुलन समरस निहारा ।
जीवन में समता की सौरभ से बही धारा थी ।
ह्रदय में करुणा छलाछल थी ।
वीर – वाणी का अमित बल था ।
तम घटाओं को कुचलकर
ज्योतिमय सूरज उतरा ।
सत्य समता की अविरल बही धारा थी ।
सत्य समता के तटों से ,
बही उन्मुक्त धारा थी ।
उस सनातन युग – पुरुष को ,
महात्मा महाप्रज्ञ को ,
आज के दिवस पर
कोटि – कोटि शत वंदन हमारा है ।
प्रदीप छाजेड़
( बोरावड़ )

