जेनेरिक से नवाचार तक का सफर
(सस्ती दवाओं के निर्यात में अग्रणी, पर सक्रिय संघटकों के लिए आयात पर निर्भरता)
— डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत आज वैश्विक स्तर पर सस्ती दवाओं के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ताओं में से एक बन चुका है। “विश्व की फार्मेसी” के रूप में उसकी पहचान केवल एक उपमा नहीं, बल्कि उसकी उत्पादन क्षमता, निर्यात विस्तार और वैश्विक जनस्वास्थ्य में उसके योगदान का सशक्त प्रमाण है। वर्ष 2025-26 तक भारतीय औषधि बाजार 50 अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर चुका है और वैश्विक जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति में उसका योगदान 20 प्रतिशत से अधिक है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी भारतीय कंपनियां लगभग 40 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करती हैं, जबकि अफ्रीका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों में जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता में भारत की भूमिका अत्यंत निर्णायक है। यह उपलब्धि 1970 के दशक में पेटेंट कानूनों में हुए परिवर्तन का परिणाम है, जब भारत ने प्रक्रिया पेटेंट प्रणाली को अपनाकर घरेलू उद्योग को सशक्त किया और सस्ती दवाओं के उत्पादन का मार्ग प्रशस्त किया।
किन्तु इस चमकदार उपलब्धि के पीछे एक गहरा विरोधाभास भी छिपा हुआ है। भारत जहां एक ओर तैयार दवाओं का प्रमुख निर्यातक है, वहीं दूसरी ओर उनके निर्माण के लिए आवश्यक कच्चे माल और सक्रिय औषधीय संघटकों के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है। अनुमानतः भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 60 से 70 प्रतिशत सक्रिय औषधीय संघटक विदेशों से आयात करता है, जिसमें प्रमुख हिस्सा चीन से आता है। पेनिसिलिन जी, क्लैवुलैनिक अम्ल और पैरासिटामोल जैसे महत्वपूर्ण संघटकों के मामले में यह निर्भरता 80 प्रतिशत से भी अधिक है। यह स्थिति केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।
कोविड-19 महामारी ने इस निर्भरता की वास्तविकता को स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया। चीन में लॉकडाउन के कारण आपूर्ति बाधित होते ही भारत में दवा उत्पादन प्रभावित हुआ। अनेक औषधि निर्माण इकाइयों को उत्पादन घटाना पड़ा और कुछ को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। इससे यह स्पष्ट हो गया कि कच्चे माल की आपूर्ति में व्यवधान भारत की औषधि उत्पादन क्षमता को तुरंत प्रभावित कर सकता है। इस अनुभव ने आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को और अधिक प्रासंगिक बना दिया।
इसी संदर्भ में सरकार ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के माध्यम से लगभग 16,000 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की, जिसका उद्देश्य घरेलू स्तर पर सक्रिय औषधीय संघटकों के उत्पादन को बढ़ावा देना है। यद्यपि इस दिशा में कुछ प्रगति हुई है, फिर भी अनेक संरचनात्मक समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। उच्च उत्पादन लागत, तकनीकी सीमाएं तथा कठोर पर्यावरणीय नियमों के कारण कई उत्पादन इकाइयां बंद हो चुकी हैं, जिससे घरेलू उत्पादन क्षमता सीमित हो गई है।
नियामक ढांचे की कमजोरी भी इस क्षेत्र की एक प्रमुख चुनौती है। केंद्रीय और राज्य स्तर पर औषधि नियंत्रण संस्थाओं में संसाधनों और प्रशिक्षित मानवबल की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। गुणवत्ता नियंत्रण में खामियों के कारण कई भारतीय औषधि निर्माण इकाइयों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ा है। कुछ मामलों में विदेशी नियामक संस्थाओं द्वारा आयात प्रतिबंध भी लगाए गए हैं, जिनका कारण निर्माण प्रक्रियाओं में त्रुटियां और गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन रहा है। इससे भारत की वैश्विक साख प्रभावित होती है और निर्यात संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
इसके अतिरिक्त, नकली दवाओं का बढ़ता बाजार भी एक गंभीर समस्या के रूप में उभर रहा है। यह न केवल उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि औषधि उद्योग की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है। मूल्य नियंत्रण नीतियों के कारण कंपनियों की लाभप्रदता सीमित होती है, जिससे वे अनुसंधान एवं विकास में पर्याप्त निवेश नहीं कर पातीं और मुख्यतः जेनेरिक उत्पादन तक ही सीमित रह जाती हैं।
अनुसंधान एवं विकास में निवेश की कमी भारतीय औषधि क्षेत्र की एक बड़ी कमजोरी है। जहां वैश्विक औषधि कंपनियां अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा अनुसंधान पर खर्च करती हैं, वहीं भारत में यह अनुपात अपेक्षाकृत कम है। इसका परिणाम यह है कि भारत नवाचार आधारित दवाओं, जैविक औषधियों और व्यक्तिगत चिकित्सा जैसे उभरते क्षेत्रों में पीछे रह जाता है। भविष्य में इन क्षेत्रों का महत्व तेजी से बढ़ने वाला है, और यदि भारत ने समय रहते इस दिशा में निवेश नहीं बढ़ाया, तो वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकता है।
कौशल विकास की कमी भी एक महत्वपूर्ण बाधा के रूप में सामने आती है। आधुनिक औषधि निर्माण, जैव प्रौद्योगिकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुसंधान के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन की आवश्यकता है, जो वर्तमान में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। शिक्षा संस्थानों और उद्योग के बीच समुचित समन्वय के अभाव में छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता, जिससे नवाचार की गति प्रभावित होती है।
पर्यावरणीय चुनौतियां भी इस क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं। औषधि निर्माण प्रक्रिया ऊर्जा-गहन और प्रदूषणकारी होती है, जिसके कारण पर्यावरणीय मानकों का पालन करना महंगा पड़ता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ती है और प्रतिस्पर्धात्मकता घटती है। साथ ही, डिजिटल प्रौद्योगिकी के सीमित उपयोग के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन और गुणवत्ता निगरानी में भी बाधाएं उत्पन्न होती हैं।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक समग्र, संतुलित और दीर्घकालिक रणनीति अपनाना आवश्यक है। सबसे पहले, घरेलू स्तर पर सक्रिय औषधीय संघटकों के उत्पादन को बढ़ावा देना होगा। इसके लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं का विस्तार तथा औद्योगिक क्लस्टरों का विकास किया जाना चाहिए। छोटे और मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहित करके उन्हें इस क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी के लिए सक्षम बनाना होगा।
दूसरा, अनुसंधान एवं विकास को प्राथमिकता देते हुए सरकार को कर प्रोत्साहन बढ़ाने और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग से औषधि खोज प्रक्रिया को अधिक तेज और प्रभावी बनाया जा सकता है।
तीसरा, नियामक सुधारों को लागू करना अत्यंत आवश्यक है। औषधि नियंत्रण संस्थाओं को अधिक संसाधन, तकनीकी क्षमता और स्वायत्तता प्रदान करनी होगी। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से गुणवत्ता निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
कौशल विकास के क्षेत्र में भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। शिक्षा संस्थानों और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल स्थापित कर व्यावहारिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देना होगा, ताकि एक सक्षम और नवाचारी कार्यबल तैयार किया जा सके।
पर्यावरणीय स्थिरता के लिए हरित प्रौद्योगिकियों को अपनाना भी अनिवार्य है। इससे न केवल पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि उत्पादन लागत में कमी और प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि भी संभव होगी।
अंततः, भारत को अपनी भूमिका को केवल सस्ती दवाओं के आपूर्तिकर्ता तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि नवाचार आधारित औषधियों, जैविक उत्पादों और व्यक्तिगत चिकित्सा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। इसके लिए स्पष्ट दृष्टि, सुदृढ़ नीतिगत समर्थन और निरंतर निवेश आवश्यक है। यदि भारत इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक समाधान करता है, तो वह न केवल आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करेगा, बल्कि वैश्विक औषधि परिदृश्य में एक अग्रणी शक्ति के रूप में उभरेगा।

