भाजपा की ‘युवा चेहरे’ की रणनीति पर विपक्ष का हमला, अयोध्या बना चुनावी शतरंज का मंच
(राजेश श्रीवास्तव ब्यूरो चीफ)
अयोध्या।लोकसभा चुनावों में जहाँ अयोध्या ने पूरे देश को चौंकाया था, वहीं अब विधानसभा स्तर पर भाजपा और विपक्ष के बीच एक नया संघर्ष शुरू हो गया है। ्राम मंदिर की नगरी अयोध्या, जहाँ राष्ट्रीय राजनीति की नजरें लगी हुई हैं, वहाँ भाजपा ने अपने राजनीतिक कद को सुदृढ़ करने के लिए एक रणनीतिक कदम उठाया है।
लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन की अप्रत्याशित जीत के बाद विपक्ष ने इसे ‘पीडीए’ के राजनीतिक मॉडल की राष्ट्रीय जीत के रूप में प्रचारित किया था। इसी जीत की प्रतिक्रिया में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने अयोध्या संगठन में एक बड़ा फेरबदल किया है। संगठनात्मक इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिला के कमान को कैडर से निकले दलित समाज के राधेश्याम त्यागी को दिया गया है, जो भाजपा की ‘समावेशी’ छवि को मजबूत करता है। लेकिन इसी संगठनात्मक फेरबदल में एक नाम उभरा है, जिस पर राजनीतिक बहस केंद्रीभूत हो गई हैऔर वह है, अयोध्या महानगर महामंत्री शिवेंद्र सिंह।आने वाले विधानसभा चुनाव में पूरा देश अयोध्या को देखेगा। यह केवल एक सामान्य विधानसभा चुनाव नहीं है यह भाजपा के लिए अपनी राजनीतिक साख बनाए रखने का सवाल है।लोकसभा में हार के बाद विधानसभा स्तर पर भाजपा को अपनी मजबूत उपस्थिति दिखानी होगी। ऐसे में अयोध्या विधानसभा का परिणाम न केवल उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण संदेश देगा।
विपक्ष की ओर से अयोध्या विधानसभा की कमान लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति के चेहरे पवन पांडे के हाथों में है। वे 2012 में अयोध्या विधानसभा सीट जीत चुके हैं और लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के उपाध्यक्ष भी रहे हैं।विपक्ष की ओर से यह एक सुचिंतित रणनीति है छात्र राजनीति के एक प्रभावशाली नाम को आगे रखना।वही भाजपा की काट में अब शिवेंद्र सिंह है।
भाजपा ने विपक्ष के इस कदम के जवाब में अपनी रणनीति तैयार कर ली है।अयोध्या के साकेत महाविद्यालय से निकले तेजतर्रार छात्र नेता शिवेंद्र सिंह को महानगर महामंत्री का दायित्व दिया गया है।यह निर्णय भाजपा की एक सुविचारित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।शिवेंद्र सिंह भाजपा की संगठनात्मक राजनीति में एक परिचित नाम हैं।2015-2016 में विद्यार्थी परिषद् को साकेत महाविद्यालय छात्रसंघ चुनावों में उन्होंने 4 में से 3 पदों पर विजय दिलाई थी।एकता सिंह को ‘ऐतिहासिक अध्यक्ष’ बनाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। इसी कार्य-प्रदर्शन के कारण वे भाजपा के संगठन तंत्र की नजर में आए।2017 में जब उन्होंने सहकारी गन्ना समिति के अध्यक्ष पद को समाजवादी पार्टी से छीनकर अपने भाई दीपेंद्र सिंह को भाजपा की टिकट से जिताया, तब उनकी प्रतिभा को और अधिक मान्यता मिल गई।2022 विधानसभा चुनाव में भी शिवेंद्र भाजपा के स्टार प्रचारक रहे।लेकिन शिवेंद्र सिंह के नाम की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि कठिन माने जाने वाले मिल्कीपुर उपचुनाव से जुड़ी है।लगभग एक साल पहले मिल्कीपुर उपचुनाव में भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर थी। ऐसे नाजुक समय में शिवेंद्र सिंह के सटीक चुनावी प्रबंधन ने भाजपा को जीत दिलाई। यह जीत भाजपा के लिए प्रतीकात्मक थी, और शिवेंद्र सिंह भाजपा के ‘आँखों के तारे’ बने।शिवेंद्र सिंह की राजनीतिक शक्ति केवल चुनावी प्रबंधन तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपनी माता श्रीमती ऊषा सिंह को पूरा बाजार से भाजपा के कोटे से पहली बार प्रमुख बनाया। इस कदम के बाद से शिवेंद्र ने समाज सेवा को ही अपनी राजनीति की मुख्य धुरी बना दिया है।स्वर्गीय पिता प्रभात सिंह की स्मृति में आयोजित वार्षिक कार्यक्रमों में लगभग बीस हजार लाभार्थी भाग लेते हैं। यह आंकड़ा शिवेंद्र के जनाधार की व्यापकता को दर्शाता है। भाजपा के किसी भी संगठनात्मक कार्यक्रम में चाहे सदस्यता अभियान हो फिर एकता यात्रा, अथवा नवनियुक्त अध्यक्ष पंकज चौधरी का स्वागत समारोह शिवेंद्र की जनसभा जुटान क्षमता अन्य किसी नेता से अलग दिखती है।शिवेंद्र सिंह के महानगर महामंत्री के नियुक्ति की घोषणा के तुरंत बाद विपक्ष ने अपना आईटी सेल सक्रिय कर दिया।सोशल मीडिया पर शिवेंद्र सिंह के खिलाफ एक सुसंगठित अभियान चलाया जा रहा है। यह अभियान न केवल शिवेंद्र के चरित्र पर सवाल उठा रहा है, बल्कि भाजपा की रणनीति को भी चुनौती दे रहा है।विपक्ष का मुख्य तर्क यह है कि शिवेंद्र सिंह के खिलाफ कई राजनीतिक मामले दर्ज हैं, और उन पर सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में भी कई प्रश्नचिन्ह लगे हुए हैं।विपक्ष का यह भी कहना है कि भाजपा एक ऐसे नाम को आगे कर रही है, जिसकी राजनीति विवादास्पद है। इस तर्क का उद्देश्य स्पष्ट है शिवेंद्र सिंह की विश्वसनीयता को क्षतिग्रस्त करना।
देखना दिलचस्प होगा शह मात के इस खेल में शिवेन्द्र सिंह किस प्रकार आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा की पुनः विजय की राह प्रशस्त कर पायेंगे?

