स्वबोध का अभियान योग्य बनाना है – आनंद प्रभु

गुरु का सम्यक ज्ञान यदि शिष्य में प्रवाहित नहीं हुआ तो वह गुरू अयोग्य और अमुक्त है । सनातन यही सिखाता है कि – गुरू ऐसा चाहिए जो निर्मित कर दे, बोध करा दे । स्वबोध दीप जागरण का लक्ष्य ही है – स्वबोध: परमोधर्म: । वह धर्म जो हमारे ऋषियों – मनीषियों की लाखों पीढ़ियों की साधना का प्रतिफल है , जिसने नाम रूप का बोध कराया, जो तीसरी ज्योति की वजह से आया वही सनातन है । किसी भी बात के तीन प्रमाण होते हैं । पहला प्रमाण गुरू , दूसरा प्रमाण शास्त्र और तीसरा स्वतः किया हुआ अनुभव । स्वतः सिद्ध ऋषियों – मनीषियों के लाखों-लाख वर्ष की साधना का प्रतिफल सनातन ईश्वर को खोजने का नहीं वरन् जीने का संदेश है, जिसे अमर बनाने के लिए सनातन होना पड़ेगा ; जिसका विधान है उपनयन अर्थात- आँखों के नजदीक एक और आँख । तात्पर्य समझ शक्ति का विकसित हो जाना , यही स्वबोध है । परन्तु दुर्भाग्यवश हम अपने वेद वाक्य ” कृणवन्तु विश्वम् आर्यं ” के उद्घोष से विमुख हो रोटी , कपड़ा और मकान में ही उलझे रहे जबकि इतर धर्मावलम्बी संकल्प के साथ भोजन और आवास की चिंता किये बिना अपने धर्म के विस्तार के लिए आहूत होने को तत्पर हैं परिणाम पांथिकता में उलझ विश्व को अपने ज्ञान से समृद्ध करने वाला सनातन सिमटकर रह गया । यह उद्बोध अपनी शिष्या , स्वबोध आश्रम की संचालिका डाॅक्टर सरोजिनी माँ के साथ हनुमान नगर, कांदिवली (पूर्व), मुम्बई स्थित भारतरत्न पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई सभागृह में पधारे स्वबोध आश्रम ज्योतिर्धाम पीठ के पीठाधीश्वर प्रज्ञा पुरुष ऊँ श्री आनंद प्रभु द्वारा किया गया । कार्यक्रम की शुरूआत सपत्निक उपस्थित स्वबोध दीप जागरण के संरक्षक राकेशमणि तिवारी द्वारा दीप प्रज्वलन और गुरुपूजन के साथ हुई। संस्था के प्रबंधक- सुकूनराज ओटाक, निधि प्रमुख- घनश्याम सिंह, संयोजक- विपिन सिंह सहित तमाम भक्तों का योगदान उल्लेखनीय रहा ।

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