इस बार सर्दी में रामलला खाएंगे रबड़ी, सुबह लगेगा भोग

रामलला वैसे तो अभी अस्थाई गर्भगृह में हैं, लेकिन अब उनके उनके ठाठ-बाट में कोई कमी नहीं है। मौसम के अनुसार उन्हें भोग लगाया जाता है, कपड़े पहनाए जाते हैं। सर्दी व गर्मी से बचाने के लिए उपकरण भी लगाए जाते हैं। हर उत्सव उनके दरबार में भव्यता से मनाया जाता है। उनके ठाठ-बाट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर रोज उनकी सुबह पंचमेवा व पेड़ा से होती है, लेकिन अबकी सर्दी से रामलला को पेड़ा के स्थान पर रबड़ी का भोग अर्पित किया जाएगा।

रामलला को सुबह से शाम तक तीन बार भोग लगता है। सुबह बाल भोग, दोपहर में राजभोग व शाम को संध्या भोग लगाया जाता है। उन्हें सुबह 6:30 बजे बाल भोग में पंचमेवा यानि की गरी, छुआरा, किशमिश, चिरौंजी व मिश्री परोसी जाती है। इसके बाद पेड़ा अर्पित किया जाता है, लेकिन अब पेड़ा की जगह पर रबड़ी का भोग लगाया जाएगा। प्रथम पाली में दर्शन खत्म होने के बाद दोपहर 12 बजे रामलला को राजभोग लगाया जाता है। राजभोग में उन्हें दाल, चावल, रोटी-सब्जी अर्पित की जाती है। आखिरी भोग संध्या भोग होता है जो दूसरी पाली में दर्शन खत्म होने के बाद शाम 7:30 बजे लगाया जाता है। संध्या भोग में पूड़ी, सब्जी और खीर अर्पित की जाती है।

श्रीराम जन्मभूमि के मुख्य अर्चक आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि अब रामलला के ठाठ-बाट में कोई कमी नहीं है। रामलला को खीर बहुत पसंद है। जिसे पंचमेवा व मखाना से बनाया जाता है। हर रोज एक बार उन्हें खीर जरूर परोसी जाती है। मुख्य अर्चक ने बताया कि रामलला का भोग शुद्ध देशी घी में तैयार किया जाता है। इस बार सर्दी में उन्हें रबड़ी का भोग लगाने की तैयारी है। इसको लेकर ट्रस्ट की सहमति मिल गई है। सुबह बाल भोग में उन्हें रबड़ी भी अर्पित की जाएगी। इस दौरान मंदिर में मौजूद भक्तों को प्रसाद भी दिया जाएगा।

रामलला भले ही बालरूप में विराजमान हों बावजूद इसके वह हर एकादशी को व्रत रहते हैं। उन्हें फलाहार का भोग लगाया जाता है। इसमें कुट्टू या सिंघाड़े के आटे की पूड़ी, पकौड़ी व सेंधा नमक से बनी सब्जी परोसी जाती है। रामलला के भोग में लहसुन-प्याज निषिद्ध होता है। उन्हें मसूर की दाल भी नहीं अर्पित की जाती, अन्य दालें उन्हें पसंद हैं। रामलला की प्रतिदिन पांच बार आरती होती है।

आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि रामलला की सुबह सात बजे शृंगार आरती, दोपहर 12 बजे भोग आरती व शाम को दर्शन बंद होने के बाद करीब 7:30 बजे संध्या आरती होती है। ट्रस्ट ने शृंगार व भोग आरती में जहां 30-30 भक्तों को शामिल होने की अनुमति दी है। वहीं संध्या आरती में 60 भक्त शामिल हो सकते हैं। इसके लिए ट्रस्ट पास जारी करता है।

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