अयोध्या।(डा.अजय तिवारी जिला संवाददाता)जिला मुख्यालय से करीब 16 किलोमीटर की दूर पर अयोध्या – प्रयागराज राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित भरतकुंड यूं तो भगवान राम के वनवास के दौरान भरत की तपोभूमि के तौर पर प्रतिष्ठित है, लेकिन इस स्थान की पहचान सिर्फ इतनी भर ही नहीं है।यही वह स्थान है, जो वनवास से लौटे राम और भरत के मिलन का साक्षी रहा। भगवान विष्णु का बाए पांव का गयाजी में तो दाहिने पांव का चरण चिह्न भरतकुंड में गयावेदी पर है। वनवास से लौटने पर भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का तर्पण यहीं किया।तभी से यहां पिंडदान की परंपरा है। मान्यता है कि भरतकुंड में किया पिंडदान, गया तीर्थ के समान फलदायी है। इसीलिए भरतकुंड को ‘मिनी गया’ का दर्जा भी दिया गया है और पितृपक्ष में भरतकुंड आस्था का केंद्र होता है। प्रतिवर्ष देश भर से जुटने वाले श्रद्धालु अपने पुरखों का पिंडदान कर मोक्ष की कामना करते हैं।हजारों वर्ष बीतने के बाद भी भरत जी के तप का प्रवाह इस भूमि पर अब भी महसूस किया जा सकता है। भगवान राम के वनवास के दौरान भरतजी ने उनकी खड़ाऊ रख कर यहीं 14 वर्ष तक तप किया था। भगवान के राज्याभिषेक के लिए भरत 27 तीर्थों का जल लेकर आए थे, जिसे आधा चित्रकूट के एक कुंए में डाला था,वही बाकी भरतकुंड स्थित कुएं में। यह कुआं आज भी मौजूद है। श्रद्धालु गयावेदी पर पिंडदान के उपरांत भरतकुंड में स्नान करते हैं। श्रावस्ती से अपने पूर्वजों का पिंडदान करने आए राजेंद्र प्रसाद कहते हैं कि यहां किया पिंडदान पुरखों को मोक्ष प्रदान करने वाला है।जिसके चलते हम यहां आए हैं।गोंडा से पिंडदान करने आए भगवानदास तिवारी कहते हैं कि भगवान के प्रति हमारी आस्था दृढ़ है, लेकिन यहां व्यवस्थागत खामियां बहुत हैं। स्थानीय पुरोहित उमाशंकर पांडेय ने बताया कि गयावेदी पर हजारों लोग पिंदडान करने के लिए आते हैं, लेकिन बिजली की व्यवस्था नहीं है। वे कहते हैं, प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में देश भर से लोगों का आना होता है।इसलिए भरतकुंड की व्यवस्थाओं को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।

