स्ट्रोक के इलाज में हर सेकंड अहम, समय पर उपचार से बच सकती है जान और विकलांगता*

 

 

*स्ट्रोक के इलाज में हर सेकंड अहम, समय पर उपचार से बच सकती है जान और विकलांगता*

 

– स्ट्रोक के इलाज में हर मिनट अहम, जागरूकता और बेहतर इलाज की जरूरत पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

 

*लखनऊ, 11 जुलाई, 2026:* भारत में हर साल करीब 18 से 20 लाख लोग स्ट्रोक का शिकार होते हैं। स्ट्रोक से मौत के साथ-साथ स्थायी विकलांगता का खतरा भी रहता है। ऐसे में इसकी समय पर पहचान, तुरंत जांच और जल्दी इलाज बहुत जरूरी है। मेदांता हॉस्पिटल में स्ट्रोक पर आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में डॉक्टरों ने स्ट्रोक की पहचान, इलाज, बचाव और पुनर्वास को लेकर कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

 

कार्यक्रम में डॉ. रवि शंकर, डायरेक्टर न्यूरोसर्जरी, डॉ. रतीश जुयाल, डायरेक्टर न्यूरोलॉजी, डॉ. कमलेश सिंह भैसोरा, डायरेक्टर न्यूरोसर्जरी और डॉ. रोहित अग्रवाल, डायरेक्टर इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी भी मौजूद रहे।

 

डॉ. अनूप कुमार ठक्कर, डायरेक्टर न्यूरोलॉजी ने कहा, “स्ट्रोक के इलाज में समय सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। अगर किसी व्यक्ति का चेहरा टेढ़ा हो जाए, हाथ या पैर में अचानक कमजोरी आ जाए या बोलने में परेशानी हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लोगों को BE FAST के इन संकेतों की जानकारी होनी चाहिए। स्ट्रोक के इलाज के लिए सिर्फ साढ़े चार घंटे का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान आईवी थ्रोम्बोलाइसिस से विकलांगता का खतरा काफी कम किया जा सकता है। मेदांता लखनऊ में स्ट्रोक के मरीज का 24 घंटे तक भी थ्रोम्बोलाइसिस के माध्यम से का उपचार किया जा सकता है।

 

उन्होंने कहा, “हर जिला अस्पताल में आईवी थ्रोम्बोलाइसिस की सुविधा होनी चाहिए। इसके लिए सीटी स्कैन, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर जांच जैसी बुनियादी सुविधाएं जरूरी हैं। इससे मरीज का इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है। जिन मरीजों की हालत ज्यादा गंभीर हो, उन्हें ‘ड्रिप एंड शिप’ व्यवस्था के तहत तुरंत बड़े अस्पताल भेजा जाना चाहिए।”

 

डॉ. राकेश कपूर, मेडिकल डायरेक्टर एवं डायरेक्टर, यूरोलॉजी एंड किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी ने कहा कि स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है। इसमें हर सेकंड मायने रखता है। समय पर इलाज मिलने से न सिर्फ जान बचाई जा सकती है बल्कि विकलांगता को भी रोका जा सकता है। जागरूकता, स्वस्थ जीवनशैली और तुरंत मदद ही स्ट्रोक से बचाव और जीत का सबसे बेहतर रास्ता है।

 

विशेषज्ञों ने कहा कि स्ट्रोक से ठीक होने वाले मरीजों के लिए पुनर्वास भी इलाज का अहम हिस्सा है। ऐसे मरीजों के लिए फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े विशेष पुनर्वास केंद्र बनाए जाने चाहिए, ताकि वे फिर से सामान्य जीवन जी सकें। इस दिशा में आईआईटी कानपुर जैसे तकनीकी संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों के सहयोग से नई तकनीकों को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।

 

स्ट्रोक से बचाव पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान और मोटापा जैसे जोखिम कारकों की समय पर पहचान और इलाज से स्ट्रोक के मामलों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि कई पश्चिमी देशों में सिर्फ ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करके स्ट्रोक के मामलों में लगभग 45 प्रतिशत तक कमी लाई गई है। इससे दिल की बीमारियों का खतरा भी कम होता है।

 

स्ट्रोक दुनिया में विकलांगता का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। इसका असर सिर्फ मरीज पर नहीं, बल्कि उसके परिवार और पूरे समाज पर पड़ता है। इसलिए लोगों में जागरूकता बढ़ाना और बेहतर इलाज की सुविधा उपलब्ध कराना, समय पर मरीज को अस्पताल पहुंचाना, पुनर्वास सेवाओं को मजबूत करना और नई तकनीकों को अपनाना समय की जरूरत है।

 

कार्यक्रम के अंत में “हर जीवन की रक्षा, हर सेकंड की कीमत” का संदेश देते हुए लोगों से अपील की कि स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण दिखते ही बिना समय गंवाए मरीज को तुरंत अस्पताल लेकर जाएं क्योंकि समय पर इलाज ही जान बचाने का

सबसे बड़ा उपाय है।

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