भलाई का फल”*

भलाई का फल”*

बच्चों, ध्यान से सुनो।

मेरे गाँव में रमेश नाम का एक बहुत ही गरीब, लेकिन दयालु किसान रहता था। रोज सुबह खेत पर जाने से पहले वह सबसे पहले तालाब पर जाता था। वहाँ वह मछलियों को आटे की छोटी-छोटी गोलियाँ खिलाता था।

मछलियाँ भी उसे देखते ही पानी के ऊपर आ जाती थीं। मानो कह रही हों, “रमेश भैया आ गए!”

तालाब के किनारे एक पीपल का पेड़ भी था। रमेश रोज उस पेड़ को पानी देता, उसकी जड़ों के पास की मिट्टी ठीक करता और उससे ऐसे बात करता जैसे वह उसका दोस्त हो।

धीरे-धीरे समय बीता। मछलियाँ रमेश की दोस्त बन गईं और पीपल का पेड़ भी घना और मजबूत हो गया।

एक दिन अचानक मूसलाधार बारिश हुई। रमेश खेत से घर लौट रहा था। रास्ते में पैर फिसला और वह सीधे तालाब के गहरे पानी में जा गिरा। रमेश को तैरना नहीं आता था। वह डूबने लगा और मदद के लिए चिल्लाने लगा। पर उस सुनसान जगह पर उसे बचाने वाला कोई नहीं था।

तभी पीपल के पेड़ ने देखा कि उसका दोस्त मुसीबत में है। पेड़ ने तुरंत अपनी एक मोटी डाली तोड़कर पानी में गिरा दी। रमेश ने किसी तरह उस डाली को पकड़ लिया।

लेकिन वह अभी भी किनारे से दूर था। अब मछलियों की बारी थी। सभी मछलियाँ एक साथ आईं और उन्होंने मिलकर रमेश को अपनी पूँछ से धक्का देते हुए किनारे तक पहुँचा दिया।

इस तरह रमेश की जान बच गई।

*शिक्षा:*
बच्चों, इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि *”जो दूसरों की भलाई करता है, प्रकृति भी उसकी भलाई करती है।”*
इसलिए हमेशा दयालु बनो और सबकी मदद करो।

*कहानीकार:* हरिश्चंद्र सिंह

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