सावन के दूसरे सोमवार को हुई गहरेबाजी

सावन के दूसरे सोमवार को हुई गहरेबाजी

अरैल बांध रोड पर अपने अपने घोड़ों के साथ पहुंचे गहरेबाज, हर सोमवार को होगा आयोजन

प्रयागराज। संगम नगरी में सावन के महीने में हर सोमवार मशहूर गहरेबाजी धार्मिक सौहार्द का प्रत्यक्ष उदाहरण है। श्रवण माह के प्रत्येक सोमवार को जिस तरह से शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगती है। उसी प्रकार सड़कों पर घोड़ों की दौड़ यानी गहरेबाजी का रोमांच, जोश और जुनून देखने के मिलता है।

सावन के दूसरे सोमवार को यमुना किनारे अरैल रोड पर गहरेबाजी देखने के लिए सड़क के दोनों तरफ सैकड़ों लोगों का मजमा लगा रहा। करीब 200 साल पहले तीर्थ पुरोहितों ने इसकी शुरुआत की थी। जो समय के साथ घोड़े के शौकीनों और सर्व समाज को जोड़ने में सफल हुई। गंगा जमुनी तहजीब की यह वाहक भी है। क्योंकि इससे हिंदू और मुस्लिम भी शिव की साधना के रूप में रिश्ता रखते हैं। प्रतियोगिता में उद्देश्य केवल यही होता है कि लोग इसे देखें, समझें और तन-मन में श्रावणी माहौल बने।

संगम नगरी में गहरेबाजी तीर्थ पुरोहितों का पुराना शौक रही है, जिन्होंने इस खेल की शुरुआत की उनमें एक नाम स्व. छेदी पंडा उर्फ छेदी बीए का भी है। छेदी बीए से यह खेल उनके बेटे गोपाल महाराज को विरासत में मिला। गोपाल महाराज के रहते उनके दो बेटों मुरारी और बब्बी पंडा ने गहरेबाजी को जारी रखा।

गहरेबाजी की शुरुआत सबसे पहले तेलियरगंज से हुई थी। तब तेलियरगंज आलू मिल से किला रोड तक सावन के सोमवार को घोड़े दौड़ाए जाते थे। 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान सैन्य क्षेत्र में कई जेलखाने बनाए गए थे। इनमें बंदी रखे गए थे। सुरक्षा की दृष्टि से उक्त मार्ग पर घोड़ों की दौड़ रोक दी गई तो पिपरहिया मार्ग (एमजी मार्ग) पर मेडिकल चौराहा से सीएमपी डिग्री कालेज चौराहा तक यह आयोजन होने लगा। वर्तमान में इसके अलावा नैनी के अरैल बांध रोड पर भी गहरेबाजी होती

है।

 

 

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