(नई दिल्ली)शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: फायदे कम नुकसान ज्यादा, अदालत ने गिनाईं 5 बड़ी बुराइयां

(नई दिल्ली)शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: फायदे कम नुकसान ज्यादा, अदालत ने गिनाईं 5 बड़ी बुराइयां
नई दिल्ली 19 सितंबर (आरएनएस)। शराबबंदी की वास्तविक प्रभावशीलता और उसके नतीजों पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बेहद तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से फायदे के बजाय समाज और व्यवस्था को पांच बड़े नुकसान उठाने पड़ते हैं। इसके साथ ही पीठ ने गुजरात और अन्य राज्यों में पिछले कई सालों के दौरान जहरीली शराब से हुई मौतों और त्रासदियों का हवाला देते हुए सरकारों को हकीकत का आईना दिखाया।
सुप्रीम कोर्ट ने गिनाए शराबबंदी के पांच बड़े दुष्प्रभाव
जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने शराबबंदी से जुड़े दुष्परिणामों को रेखांकित किया। पीठ ने कहा कि प्रतिबंध से सरकार को भारी राजस्व का नुकसान होता है, जबकि इसे लागू करने और निगरानी तंत्र पर सरकारी खजाने से भारी-भरकम राशि खर्च करनी पड़ती है। इसके अलावा, अवैध धंधे को संरक्षण मिलने से पुलिस और प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार तेजी से पैर पसारता है। वहीं, वैध शराब न मिलने के कारण बाजार में नकली व जहरीली शराब का काला धंधा पनपता है और लोग शराब न मिलने पर ड्रग्स जैसे अन्य जानलेवा नशों की तरफ आकर्षित होने लगते हैं।
गुजरात का उदाहरण: पाबंदी के बावजूद 600 से अधिक मौतें
अदालत ने कहा कि इतिहास गवाह है कि पूर्ण शराबबंदी अक्सर शराब के कारोबार को भूमिगत और अवैध कर देती है, जिससे जानलेवा व अनियंत्रित शराब का चलन बढ़ता है। पीठ ने गुजरात का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि सख्त शराबबंदी के बावजूद राज्य में आजादी के बाद से अब तक 10 से ज्यादा बड़ी जहरीली शराब त्रासदियां हो चुकी हैं, जिनमें 600 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। अदालत ने हाल ही में गुजरात के भावनगर में 13 और मध्य प्रदेश के सागर में 15 लोगों की जहरीली शराब से हुई मौतों को सिस्टम के लिए खतरे की घंटी करार दिया।
महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के नियम 18्र और 18क्च रद्द
इंडियन केमिकल काउंसिल और विभिन्न रसायन निर्माता कंपनियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के नियम 18्र और 18क्च को पूरी तरह रद्द कर दिया। ये नियम 1991 के मुंबई जहरीली शराब कांड के बाद बनाए गए थे, जिनके तहत मेथनॉल की बिक्री में कड़वा पदार्थ और रंग मिलाना अनिवार्य किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ अच्छी मंशा होना ही नियमों की मनमानी को सही नहीं ठहरा सकता। सरकार यह साबित करने में विफल रही कि ऐसे एडिटिव्स मिलाने से जहरीली शराब से होने वाली मौतों को कैसे पूरी तरह रोका जा सकता है।
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