
अब श्रीलंका ने आर्थिक संकट से उसे निकालने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार लगाई है। बढ़ते कर्ज, महंगाई, जरूरी चीजों के अभाव और सामाजिक उथल-पुथल के कारण देश इस समय गहरे संकट में है। इस ओर ध्यान खींचते हुए श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे ने गुरुवार को कहा- ‘हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अपने दोस्तों से अपील करते हैं कि वे हमारी तुरंत मदद करें, ताकि हमारी फौरी जरूरतें पूरी हो सकें।’
राजपक्षे ने यह अपील टोक्यो में हो रहे फ्यूचर ऑफ एशिया कॉन्फ्रेंस को भेजे अपने वीडियो संदेश में की। इसमें उन्होंने कहा- ‘यह किसी से छिपा नहीं है कि बीते कुछ महीने हमारे लिए बेहद कठिन रहे हैं। इस समय हम गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। इसका श्रीलंका के सभी लोगों पर भारी असर हुआ है, जिसका परिणाम सामाजिक अशांति के रूप में सामने आया है।’
कर्ज की समय-सारिणी बदलने की मांग
राष्ट्रपति राजपक्षे के यह अपील करने से ठीक पहले देश के विदेशी मुद्रा भंडार के और क्षीण होने और महंगाई और बढ़ने की खबर आई। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने श्रीलंका की सॉवरेन विदेशी मुद्रा रेटिंग को ‘सीमित डिफॉल्ट’ श्रेणी में रख दिया है। बीते अप्रैल में श्रीलंका विदेशी कर्ज चुकाने के मामले में डिफॉल्टर हो गया है। अब श्रीलंका सरकार की कोशिश यह है कि उसे कर्ज देने वाले देश कर्ज चुकाने की समय-सारणी को फिर से तय करेँ। साथ ही अपनी आयात संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए श्रीलंका जल्द से जल्द अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से नया ऋण पाना चाहता है।
इस बीच श्रीलंका में आपातकाल लागू रहने के बावजूद सरकार विरोधी आंदोलन जारी है। आंदोलनकारी राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे के इस्तीफे की मांग पर अडिग हैं। टोक्यो कांफ्रेंस को भेजे संदेश में इसी उथल-पुथल की स्थिति को राजपक्षे ने सामाजिक अशांति कहा है।
राजपक्षे ने कहा- ‘हमने एक नए प्रधानमंत्री और विभिन्न दलों की नुमाइंदगी वाले नए मंत्रिमंडल की नियुक्ति की है। हम राष्ट्रीय आम सहमति तैयार करने के लिए संसद में चर्चा कर रहे हैं, ताकि समस्या से निकलने का रास्ता तैयार हो सके।’ विश्लेषकों की राय है कि श्रीलंका में जारी अशांति के कारण आईएमएफ सहित किसी नए कर्जदार से ऋण पाना और कठिन हो गया है। ऐसे में राष्ट्रपति ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि राष्ट्रीय आम सहमति तैयार कर वे देश में आम हालत बहाल करने की तरफ बढ़ रहे हैं।
बच रहे संकट की जिम्मेदारी लेने से
टोक्यो कांफ्रेंस को भेजे गोटबया राजपक्षे के भाषण से यह संकेत भी मिला कि मौजूदा संकट की पूरी जिम्मेदारी अपने माथे पर लेने के लिए वे तैयार नहीं हैं। उन्होंने समस्या को अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में पेश करने की कोशिश की। राजपक्षे ने कहा कि इस समय दुनिया में खाद्य पदार्थों का अभाव एक व्यापक समस्या बन गई है। आने वाले महीनों में भी यह अभाव बना रहेगा, जिससे कई देशों में गंभीर मुश्किलें खड़ी होंगी।
जबकि श्रीलंका में उनके खिलाफ आंदोलन चला रहे लोग इस संकट के लिए उन्हें और उनके परिवार को पूरी तरह दोषी मानते हैं। श्रीलंका में आम राय है कि राजपक्षे की गलत और स्वार्थी नीतियों ने देश को मौजूदा दुर्दशा तक पहुंचाया है। साथ ही देश में ये धारणा भी है कि जब संकट के शुरुआती लक्षण दिखने लगे, तब राजपक्षे सरकार ने उचित कदम नहीं उठाए।
अब राष्ट्रपति ने अपनी उम्मीद अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जोड़ी है। उन्होंने कहा कि श्रीलंका और दूसरे कमजोर देशों की मदद करने से पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को लाभ होगा। लेकिन इस अपील से श्रीलंका को तुरंत क्या सहायता मिलेगी, यह अभी साफ नहीं हुआ है।

