आंकड़ों की बाजीगरी जो शायद जनता को तो क्या ये कि सत्ता पक्ष में बैठे सांसदों को भी समझ में नहीं आयेगा
ब्यूरो चीफ आर एल पांडेय
लखनऊ। बजट चर्चा पर लखनऊ व्यापार मण्डल की कोर कमेटी की बैठक सम्पन्न हुई, जिसमें मुख्य रूप से चेयरमैन राजेन्द्र कुमार अग्रवाल सचेतक अनिल विरामनी अध्यक्ष अमरनाथ मिश्र वरिश्ठ महामंत्री पवन मनोचा कोषाध्यक्ष देवेन्द्र गुप्ता अनुराग मिश्र जितेन्द्र सिंह चैहान, अजय पिपलानी, युवा अध्यक्ष मनीष गुप्ता, सुमित गुप्ता, प्रियांक गुप्ता आदि उपस्थिति रहे।
अध्यक्ष अमरनाथ मिश्र ने बताया कि आज वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने आम बजट पेश किया उपरोक्त विषय पर अध्यक्ष जी ने कहा कि आंकड़ों की बाजीगरी जो शायद जनता को तो क्या ये कि सत्ता पक्ष में बैठे सांसदों को भी समझ में नहीं आयेगा। इसमें सिर्फ एनडीए का चुनावी गठबंधन का असर दिखा विहार आॅध्र प्रदेश और कुछ हद तक ओडिशा असम के लिए बाकी आम जनता से सम्बन्धित कुछ नहीं।
अगर व्यापारी समाज की बात की जाय तो कुछ भी नहीं विचारणीय है कि अटल विहारी बाजपाई की जब सरकार नहीं आयी थी उसके पहले से भाजपा की मांग थी इनकम टैक्स में आय की सीमा ज्यादा होनी चाहिए बल्कि 2014 से पहले तो इनके घोषणा पत्र में 5लाख तक कर मुक्त आय की घोषणा की थी जो कि आज तक नही ंकर पाये जबकि आर्थिक आधार आरक्षण या 8लाख पर देते है तो फिर 10 लाख तक के करमुक्त आय क्यों न होनी चाहिए।
राजेन्द्र कुमार अग्रवाल ने कहा कि मुद्रा लोन की सीमा 20लाख की मगर उसको मिलेगा जो अपना 10 जमा कर चुका है तो क्या फायदा एक व्यापारी को चलता व्यापार बढ़ाने के लिए पॅूजी जरूरी है।
अनिल विरमानी जी ने कहा कि सरकार का यह कहना है कि सब कुछ आॅन लाइन कर रही है और इस आॅल डूइंग बिजनेश कर रही है लेकिन इसके विपरीत यदि आप दवा की दुकान करते है तो आपको 1 ड्रग लाइसेन्स लेना है और यदि आप फ्रूड सप्लीमेंट उसमें बेचते है जो कि डा. साथ-साथ दवा के लिखते है तो अपको अलग से फूड डिपार्टमेन्ट में पंजीकरण कराना है जबकि दोनो के कागज एक ही लगते है और प्रक्रिया भी एक है ऐसे में एक ही दस्तावेजों से दोनो लाइसेन्स जारी होने चाहिए।
पवन मनोचा जी ने कहा कि टेक्सटाइल पर कस्टम छूट का फायदा किसी तर जनता को नहीं मिलेगा।
देवेन्द्र गुप्ता जी ने कहा कि आम बजट में उत्तर प्रदेश के लिए कूछ नहीं मिला जो कि उत्तर प्रदेश के लोगों को बड़ी निराशा है।
आज जो स्लैब में इन्होने बदलाव किया उस वजह 3-6 थ जिसे 3-7 कर दिया 6-9 जो था उसको 7-10 दिया उसी जगह इन्होंने 10-15 के बीच में उसको कवर कर लिया तो फायदा किसका होगा। बहुप्रतिक्षित था की लोकल टेªडर्स को संरक्षित करने के लिए सरकार कोई योजना ई-कामर्स में लाएगी परन्तु मरते हुए व्यापार को जिन्दा करने के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं जीएसटी को लागू हुए 7वर्ष पूरे हो गये है लेकिन अभी भी सरकार का प्रयोग जारी है न तो ट्रिव्यूनल बना पाई है न ही अधिकारियों के द्वारा किया जा रहा उत्पीड़न समाप्त कर पायी है न ही व्यापारियों की सबसे बड़ी मांग की 16-4सी के तहत पोर्टल पर देखे गये एक्टिव व्यापारी से माल खरीदने के बाद यदि वह डिफाल्टर होता है तो यह बोगस साबित होता है तो क्रेता की जिम्मेदारी क्यों सरकार ध्यान नहीं दे पायी है व्याप्त व्यापार जगत के लिए कोई भी अच्छी घोषणा नहीं सिर्फ आंकड़ो की बाजीकरी और अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन भाजपा अपने सबसे वोटर यानी मध्यम वर्ग व्यापारी समाज को खो देगी और फिर इनके पास कोई रास्ता न होगा कि मंहगायी देखते हुए आम जनता के लिए बजट समझ पाना या उसमें कोई फायदा देखना असंभव है शिक्षा चिकित्सा जिन पर जीडीपी का कम से कम 6-7 प्रतिशत की आशा थी कि सरकार पर विजन करेगी वो भी नहीं हुआ कुल मिलाकर आंकड़ो की बाजीगरी और आम व्यापारी से बहुत दूर का बजट पूर्व में कई ज्ञापन मुख्यमंत्री जी वित्तमंत्री एवं रक्षा मंत्री जी के माध्यम से दिया गया यहाॅ तक कि जिलाधिकारी और जीएसटी कमिश्नर के माध्यम से भी भेजे गये जिसमें लाइसेन्स राज इंस्पेक्टर राज को खत्म करने के लिए तमाम सुझाव दिये गये जैसे एक तरीके का कारोबार करने पर सारे लाइसेंस फ्रूड लाइसेंस आबकारी मंडी के लाइसेन्स मगर सरकार के द्वारा इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया इसी तरह जीएसटी की विसंगतियों पर कई बार चर्चा के बाउजूद कोई सुधार नहीं हुआ यहाॅ ध्यान देने योग्य यह बात है कि अगर एक्ट में ये लिखा है कि व्यापारी को विक्रेता के द्वारा कर न चुकाने पर अर्थदंड सहित कर देना होगा तो ये भी एक्ट में है कि ट्रिब्युनल के स्थापना हो होगी और व्यापारी वहाॅ अपील कर सकता है तो 7 साल यदि ट्रिब्यूनल नहीं बना तो इसका अर्थ दंड कौन देगा 3 साल जो सरकारी वेबसाइट में कमी आ रही थी जिसके कारण धारा 74 के तहत व्यापारी को तमाम अर्थदण्ड एव ंकर का भुगतान करना पड़ा सरकार की कमियों पर अर्थदण्ड कौन लागायेगा कुल मिलाकर के मौजूदा सरकार हम व्यापारी समाज को उपेक्षित रखते हुए उसे के हितों का संरक्षण करने में असमर्थ है व्यापारी समाज के लिए एक निराशाजनक बजट है।

