सुझाव एवं सलाह अपने अधिवक्ता भाइयों के लिए

प्रिय सम्मानित अधिवक्ता बंधुओं ।
जिन्हें पता हो उन्हें पुनः याद दिला दें, जिन्हें पता न हो उन्हें बता दें कि वर्ष 1976 में तत्कालीन जनपद न्यायाधीश श्री एस के श्रीवास्तव ने एक आर्डर सर्कुलेट किया कि —
“All the advocates are directed to file” vakalatnama in place of purcha in bail applications ” उस समय इस आदेश के कारण अधिवक्ताओं को बहुत ही कठिनाइयों का सामना कर करना पड़ा, जो अभियुक्त अपने जनपद कारागार में निरुद्ध थे वकालत मामले पर उनके हस्ताक्षर थोड़ी कठिनाई से तो प्राप्त हो जाते थे, लेकिन अन्य जनपदों में निरुद्धों के हस्ताक्षर मिलने बहुत ही कठिन हो जाते थे । इसमें समय और धन का बहुत अपव्यय होता था ।उस समय हमारे सीनियर स्वर्गीय श्री हीरालाल प्रजापति जी ने माननीय उच्च न्यायालय के एक फैसले का हवाला देकर जनपद न्यायाधीश के समक्ष जमानत प्रार्थना पत्र दिया जिसे उन्होंने क्रोध और उत्तेजना में खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय के उसे फैसले में यह कहा गया था कि “No advocate can be compelled to file vakalatnama in place of purcha” वकील साहब ने उस आदेश की कापी लेकर प्रजापति जी ने माननीय उच्च न्यायालय में ,जनता न्यायाधीश के विरुद्ध और अवमानना की याचिका दायर की, जिसमें न्याय मूर्ति महोदय ने श्री एस के श्रीवास्तव को आदेश दिया गया कि आप एक माह के अंदर जवाब दें कि क्यों न आपके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही हो। आप लोगों को बता दूं कि इसके बाद माननीय एस के श्रीवास्तव को गंभीर परिणाम भुगतने पड़े। अतः आवश्यकता है कि अंतरिम जमानत प्रार्थना पत्र देते समय उल्लिखित रुलिंग्स को साइट करते हुए प्रार्थना पत्र दिया जाए और उसके खारिज होने के बाद उसकी सत्यापित नकल लेकर उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत की जाए । हमें पूरा विश्वास है कि निश्चित रूप से अनुकूल और वांछित परिणाम प्राप्त होंगे।
अधिवक्ता -विजय प्रकाश श्रीवास्तव, सिविल कोर्ट, जौनपुर

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