स्टडी हॉल विद्यास्थली के छात्रों ने साहित्यिक कृतियों के माध्यम से दिया समानता और न्याय का संदेश
लखनऊ: स्टडी हॉल विद्यास्थली ने 21 नवंबर को अपने कैंपस, कनार (मलिहाबाद) में वार्षिक समारोह “कैलिडोस्कोप 2025” का आयोजन किया। यह कार्यक्रम विश्व की महान साहित्यिक कृतियों को समर्पित एक रंगारंग प्रस्तुति रहा। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि थीं सुश्री अर्चना सिंह, सेंटर मैनेजर, लखनऊ। प्री-प्राइमरी से कक्षा 12 तक के 500 से अधिक छात्रों ने संगीत, नृत्य, नाटक और कथन के माध्यम से देश-विदेश के प्रसिद्ध साहित्य से प्रेरित प्रस्तुतियाँ दीं, जिनमें कई महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों को उठाया गया।
बच्चों ने शाम भर में महिलाओं के प्रति अन्याय और समाज में बढ़ती विभाजनकारी सोच जैसे मुद्दों को मंच पर बेहद प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। प्रस्तुतियों में गिरीश कर्नाड की नागमंडला और लुइगी पिरांडेलो की सिक्स करैक्टर्स इन सर्च ऑफ एन ऑथर जैसी रचनाएँ शामिल थीं।
मुख्य अतिथि अर्चना सिंह ने कहा, “छात्रों ने विश्व साहित्य से जुड़े गहरे विषयों को बहुत संवेदनशीलता और आत्मविश्वास से प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुतियाँ न केवल उनकी कला को दर्शाती हैं, बल्कि सामाजिक सचेतना को भी प्रकट करती हैं। स्टडी हॉल विद्यास्थली बच्चों में आलोचनात्मक सोच, अभिव्यक्ति और सहानुभूति विकसित करने का शानदार काम कर रहा है।”
स्टडी हॉल एजुकेशनल फाउंडेशन की संस्थापक और CEO डॉ. उर्वशी साहनी ने कहा, “SHEF की समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित शिक्षा की सोच के अनुरूप, हम अपने छात्रों को समाज की गहरी समस्याओं को समझने और उनसे जुड़ने के हर अवसर देते हैं। यह कार्यक्रम हमारे छात्रों को जाति और लैंगिक समानता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर समझ और इनसे निपटने के लिए सार्थक कदम उठाने के लिए एकजुट भी होते हैं।”
कार्यक्रम में प्री-प्राइमरी और कक्षा 1-2 के बच्चों द्वारा मनमोहक नृत्य प्रस्तुतियाँ शामिल थीं। वरिष्ठ कक्षाओं के छात्रों ने प्रेमचंद की ‘ईदगाह’, काफ्का की ‘द मेटामॉर्फोसिस ‘और कैथरीन मैन्सफ़ील्ड की ‘द डॉल्स हाउस ‘ जैसी प्रसिद्ध कहानियों पर आधारित प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ दीं।
विद्यालय की प्राचार्या शिप्रा वर्मा ने कहा, “आज की प्रस्तुतियों ने दिखाया कि साहित्य और कला बच्चों में सहानुभूति, समानता और सामाजिक जागरूकता को कितनी सुंदर तरह से विकसित कर सकती है। दुनिया की बड़ी कहानियों से जुड़कर बच्चे अन्याय को समझते हैं, पक्षपात को पहचानते हैं और एक अधिक समावेशी समाज की कल्पना करना सीखते हैं। उनकी प्रस्तुतियों में इन विचारों की गहराई साफ नजर आई।”

