गीता प्रवचन स्वाध्याय का 85वाँ सप्ताह सफलतापूर्वक सम्पन्न : अमित परमार

गीता प्रवचन स्वाध्याय का 85वाँ सप्ताह सफलतापूर्वक सम्पन्न : अमित परमार
देश की उपासना ब्यूरो

गीता प्रवचन स्वाध्याय का 85वाँ सप्ताह ऑनलाइन माध्यम से सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस सत्र में गीता अध्याय 14 के अंतर्गत “सत्त्वगुण और उसका उपाय” विषय पर चिंतन किया गया। श्री अमित परमार द्वारा विषय का प्रवेश कराया गया।

30 मिनट के इस साप्ताहिक स्वाध्याय में ब्रह्म विद्या मंदिर पवनार से आदरणीय ज्योत्सना दीदी तथा स्वाध्याय परिवार से आदरणीय दिलीप पवार जी द्वारा विचार प्रस्तुत किए गए। इस अवसर पर दिलीप पवार जी ने विषय का सरल, व्यावहारिक और गहन विवेचन प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ ब्रह्म विद्या मंदिर, पवनार से आदरणीय ज्योत्सना दीदी द्वारा मंगलाचरण के साथ किया गया। उन्होंने सत्त्वगुण के महत्व को स्पष्ट करते हुए बताया कि यह जीवन में प्रकाश और शुद्धता लाता है, परंतु इसके साथ निरंतर सजगता भी आवश्यक है।

इसके पश्चात आदरणीय दिलीप पवार जी ने अपने विचार रखते हुए बताया कि भले ही मनुष्य सत्त्वगुणी बन जाए, अहंकार को जीत ले और फलासक्ति का त्याग कर दे, फिर भी जब तक शरीर है, तब तक रजोगुण और तमोगुण के आक्रमण होते ही रहेंगे। क्षणिक रूप से इन पर विजय का अनुभव होने पर भी वे पुनः उभर सकते हैं, इसलिए सतत जागरूक रहना अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे समुद्र का जल वेग से भीतर प्रवेश कर खाड़ियाँ बना लेता है, उसी प्रकार रज और तम के प्रभाव मन की भूमि में प्रवेश कर अपनी छाप छोड़ देते हैं। इसलिए साधक को अपने जीवन में किसी भी प्रकार की ढिलाई नहीं रखनी चाहिए, बल्कि निरंतर सजगता और अनुशासन बनाए रखना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि जब तक आत्मज्ञान और आत्मदर्शन प्राप्त नहीं होता, तब तक साधक को सदैव सावधान रहना चाहिए। केवल जागरूक रहने का अभ्यास ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि आत्मज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य है।

इस संदर्भ में उन्होंने स्पष्ट किया कि आत्मज्ञान केवल मानसिक अभ्यास या प्रयास से नहीं, बल्कि सच्चे हृदय से प्रेमपूर्वक भगवान की भक्ति करने से प्राप्त होता है। मनुष्य रज और तम को जीतकर, सत्त्वगुण को स्थिर कर तथा उसकी फलासक्ति का त्याग कर भी अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता, जब तक उसे भगवत्कृपा प्राप्त न हो।

उन्होंने गीता के संदर्भ में बताया कि अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में भगवान ने कहा है कि एकाग्र चित्त और निष्काम भाव से की गई भक्ति ही वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य इस गहन माया को पार कर सकता है। अतः सच्ची भक्ति ही आत्मज्ञान प्राप्ति का सरल और सर्वोत्तम उपाय है।

समापन में यह संदेश दिया गया कि साधक को निरंतर जागरूक रहते हुए अहंकार और आसक्ति से मुक्त होकर निष्काम भाव से ईश्वर की भक्ति करनी चाहिए, तभी वह जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

अंत में अमित परमार ने कार्यक्रम में जुड़े सभी सहभागियों को धन्यवाद ज्ञापित किया और स्वाध्याय परिवार से नियमित रूप से जुड़े रहने का आह्वान किया।

यह साप्ताहिक स्वाध्याय प्रत्येक रविवार सायं 6:15 से 6:45 बजे ऑनलाइन आयोजित होता है। स्वाध्याय से जुड़ने के इच्छुक व्यक्ति मोबाइल नंबर 9670511153 अथवा ईमेल amitparmar47@gmail.com
के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।

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