गांव की सोच

गांव की सोच

किरण
कक्षा 11th
उत्तराखंड

बढ़ रही हूं मैं आगे हर एक कदम,
मगर चलते-चलते रुक सी गई थी मैं,
सुनकर गांव के ताने और लोगों की बातें,
उनकी बातों से मैं हो जाती हूं कभी-कभी दंग,
कोई कहे मिलता क्या है इसमें?
कोई पूछे फायदा क्या है इसमें?
पर यह तो मैं जानूँ और मेरा दिल जाने,
जब से हुई हूं मैं एक सशक्त किशोरी,
शर्म को छोड़ा, खत्म हुई झिझक मेरी,
मैंने बोलना सीखा, खुद को है जाना मैंने,
खुद से हुई है मुलाकात मेरी और,
कलम बनी है पहचान मेरी,
अब हुआ है मेरी जिंदगी का एक नया आगाज

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