डीप ब्रेन स्टिमुलेशन से पार्किंसन मरीजों को मिल सकती है नई जिंदगी
दवा का असर कम होने पर सर्जरी से मिल सकती है राहत
समय पर पहचान और इलाज से बेहतर हो सकती है जीवनशैली
ब्यूरो चीफ आर एल पाण्डेय
लखनऊ।उंगलियां जो कभी प्यार से बच्चों के सिर पर हाथ फेरती थीं, अब कांपने लगी हैं। सुबह की सैर पर फुर्ती से उठने वाले कदम अब धीमे पड़ गए हैं। यह कोई साधारण बुढ़ापा नहीं, बल्कि बढ़ती उम्र के साथ होने वाला पार्किंसन रोग है, जो धीरे-धीरे मस्तिष्क की उन कोशिकाओं को प्रभावित करता है जो शरीर की गति को नियंत्रित करती हैं। शरीर में डोपामाइन नामक केमिकल की कमी इस बीमारी की प्रमुख पहचान है। यह एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जो आमतौर पर 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती है।
मेदांता हॉस्पिटल के डायरेक्टर, न्यूरोलॉजी डॉ. अनुप कुमार ठक्कर ने बताया कि पार्किंसन के मरीजों को दवाएं नियमित रूप से और डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए। बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा बंद करना खतरनाक हो सकता है। आमतौर पर यह बीमारी उम्रदराज लोगों में पाई जाती है, लेकिन कुछ मामलों में कम उम्र के लोग भी इससे प्रभावित होते हैं। इसके प्रमुख लक्षणों में हाथों का कांपना, चलने में कठिनाई, शरीर में अकड़न और काम करने की गति का धीमा होना शामिल है।
वर्ल्ड पार्किंसन डे के अवसर पर मेदांता हॉस्पिटल में आयोजित कार्यक्रम में डायरेक्टर, न्यूरोलॉजी डॉ. रतिश जुयाल ने बताया कि पार्किंसन के लक्षणों को समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है। हाथों का आराम की स्थिति में कांपना, शरीर में अकड़न, काम में धीमापन और संतुलन बिगड़ना इसके प्रमुख संकेत हैं। अधिकांश मामलों में यह बीमारी 60 वर्ष के बाद सामने आती है, हालांकि कुछ मरीज कम उम्र में भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि प्रदूषण, कीटनाशकों का असर और कुछ पर्यावरणीय कारण भी इसके मामलों में बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।
पार्किंसन के इलाज के बारे में मेदांता के डायरेक्टर, न्यूरोसर्जरी डॉ. कमलेश सिंह भैसौरा ने बताया कि इसका इलाज आमतौर पर दवाओं से किया जाता है, जो लक्षणों को नियंत्रित करती हैं। चूंकि यह बीमारी पूरी तरह ठीक नहीं होती, इसलिए मरीजों को लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ती हैं। जब दवाओं का असर कम होने लगता है या साइड इफेक्ट बढ़ने लगते हैं, तब सर्जरी का विकल्प भी अपनाया जा सकता है।
सर्जरी के विकल्प पर मेदांता के डायरेक्टर, न्यूरोसर्जरी डॉ. रवि शंकर ने बताया कि डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) एक आधुनिक सर्जरी है, जिसमें मस्तिष्क के विशेष हिस्से को स्टिमुलेट करके बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित किया जाता है। इस तकनीक से दवाओं की जरूरत कम हो सकती है और मरीज की जीवनशैली बेहतर बनती है। इसके साथ-साथ संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, योग और मानसिक रूप से सक्रिय रहना भी इस बीमारी के प्रभाव को कम करने और इसके लक्षणों की शुरुआत को देर से होने में मददगार सा
बित हो सकता है।

