(नई दिल्ली)सीआरपीएफ में मानसिक तनाव का दौर, 5 सालों में 281 जवानों ने की खुदकुशी; 2025 में टूटे सभी रिकॉर्ड

(नई दिल्ली)सीआरपीएफ में मानसिक तनाव का दौर, 5 सालों में 281 जवानों ने की खुदकुशी; 2025 में टूटे सभी रिकॉर्ड
नई दिल्ली ,07 अगस्त ,(आरएनएस)। देश की आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले सबसे बड़े अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के जवानों को लेकर एक बेहद चिंताजनक और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। हमेशा आतंकियों और नक्सलियों से लोहा लेने वाले हमारे बहादुर जवान अब मानसिक तनाव और निजी परेशानियों से हार रहे हैं। हाल ही में सामने आए ताजा आंकड़ों के मुताबिक, बीते पांच सालों में जवानों की आत्महत्या के मामलों ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। साल 2025 में खुदकुशी के आंकड़े अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं, जिसने सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन की नींद उड़ा दी है।
ड्यूटी के दौरान सबसे ज्यादा मौतें, सिपाही वर्ग में बढ़ा तनाव
आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, साल 2025 में कुल 59 सीआरपीएफ जवानों ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, जो पिछले पांच सालों में एक रिकॉर्ड आंकड़ा है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि अपनी जान देने वालों में 80 प्रतिशत से अधिक जवान सिपाही रैंक के थे। आंकड़ों की गहराई में जाएं तो 2021 से 2025 के बीच सामने आए 262 मामलों में से 202 मामलों (करीब 77 प्रतिशत) में जवानों ने तब यह खौफनाक कदम उठाया, जब वे अपनी ड्यूटी पर तैनात थे। बाकी की घटनाएं छुट्टी पर रहने के दौरान हुईं।
घर की कलह और नौकरी का भारी दबाव बन रहा जानलेवा
इस गंभीर विषय पर हालांकि बल की तरफ से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन सीआरपीएफ के कुछ अधिकारियों ने बताया कि जवानों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं और यह प्रक्रिया लगातार जारी है। जांच में यह बात निकलकर सामने आई है कि आत्महत्या के अधिकतर मामलों के पीछे पारिवारिक विवाद और घर की परेशानियां मुख्य कारण रही हैं। इसके साथ ही, नौकरी की सख्त दिनचर्या और कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी ने जवानों के मानसिक तनाव को और भी ज्यादा बढ़ा दिया है। आपको बता दें कि लगभग 3.25 लाख की क्षमता वाले इस बल के 95 से 97 प्रतिशत जवान हर समय मोर्चे पर डटे रहते हैं, चाहे वह आतंकवादियों से निपटना हो या देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखना हो।
पांच सालों के डराने वाले आंकड़े, निचले स्तर पर सबसे ज्यादा दबाव
अगर पिछले पांच सालों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। अधिकारियों के मुताबिक, साल 2021 में 57, साल 2022 में 43, साल 2023 में 57 और 2024 में 46 जवानों ने आत्महत्या की थी, जबकि 2025 में यह आंकड़ा छलांग लगाकर 59 पर पहुंच गया। जुलाई 2026 तक के 19 मामलों को भी अगर मिला लिया जाए, तो बीते पांच सालों में कुल 281 जवानों ने मौत को गले लगाया है। इनमें से 237 जवान अराजपत्रित रैंक के थे, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि निचले स्तर पर काम करने वाले जवानों को किस हद तक दबाव और तनाव का सामना करना पड़ रहा है।
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