बल्दीराय/सुल्तानपुर। सरकारी नक्शे पर खिंची एक लकीर कभी-कभी इतनी लंबी हो जाती है कि उसे पार करते-करते आम आदमी की समस्या ही छोटी पड़ जाए। हलियापुर क्षेत्र की 29 ग्राम पंचायतों के ग्रामीण वर्षों से कुछ ऐसी ही प्रशासनिक और राजनीतिक उलझन झेल रहे हैं।
कागजों में गांव सुल्तानपुर जिले में हैं। तहसील और विकासखंड बल्दीराय है, लेकिन लोकसभा क्षेत्र अमेठी और विधानसभा क्षेत्र जगदीशपुर। यानी गांव सुल्तानपुर में, प्रशासन सुल्तानपुर में और राजनीतिक प्रतिनिधित्व अमेठी में। अब ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर हमारा प्रशासन कौन और हमारी राजनीतिक आवाज किसकी?
गांव एक, समस्या एक लेकिन दरवाजे कई!
स्थानीय समाजसेवी धनंजय सिंह, इंद्र बहादुर सिंह और प्रभात सिंह का कहना है कि वर्षों से चली आ रही इस सीमा-विसंगति का असर सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व और विकास कार्यों से जुड़े मामलों में दिखाई देता है। ग्रामीणों की परेशानी का आलम यह है कि समस्या लेकर जाएं तो पहले यह तय करना पड़ता है कि समस्या सुल्तानपुर की है या अमेठी की! अधिकारी एक जिले के, जनप्रतिनिधि दूसरे क्षेत्र के और जनता बीच में। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जवाबदेही की लकीर आखिर कहां खिंची है?
हमारा गांव किसके भरोसे?
वेद प्रताप सिंह, रणविजय सिंह, अखण्ड प्रताप सिंह उर्फ गब्बर सिंह, नीरज तिवारी, जवाहर यादव, जिला पंचायत सदस्य नरेशचंद्र उपाध्याय, रमाशंकर शुक्ल और डॉ. अजय पासवान समेत क्षेत्र के अन्य लोगों ने इस मुद्दे को लेकर सामूहिक रूप से आगे की रणनीति बनाने की बात कही है। ग्रामीणों का तंज है कि चुनाव के समय गांव सबको अपना दिखाई देता है, लेकिन समस्या आने पर वही गांव सीमा के उस पार खड़ा नजर आता है। आखिर जनता किसे अपना दरवाजा समझे?
मामला अब हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं तक
सीमा संबंधी इस समस्या को लेकर क्षेत्रीय समाजसेवियों ने लखनऊ हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं से भी चर्चा की है। संवैधानिक, प्रशासनिक और परिसीमन से जुड़े पहलुओं को समझने के बाद आगे की रणनीति तय किए जाने की बात कही गई है। हालांकि 29 ग्राम पंचायतों को किस लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र में रखा जाए, इसका अंतिम निर्णय निर्धारित कानूनी एवं संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा ही किया जा सकता है।
सुल्तानपुर लोकसभा में वापसी की मांग तेज
इसी बीच 29 ग्राम पंचायतों को पुनः सुल्तानपुर लोकसभा क्षेत्र से जोड़ने की मांग जोर पकड़ रही है। समर्थकों का कहना है कि यह किसी दल के पक्ष या विपक्ष का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुविधा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और विकास कार्यों की बेहतर निगरानी से जुड़ा जनसरोकार है। विपिन सिंह का कहना है कि प्रशासनिक सीमाओं और राजनीतिक क्षेत्रों के बीच बेहतर सामंजस्य होने से आम जनता की शिकायतों के निस्तारण और विकास कार्यों की निगरानी में आसानी होगी।
सीमाएं जनता के लिए हैं या जनता सीमाओं के लिए?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सीमांकन का मकसद शासन और प्रशासन को जनता के करीब पहुंचाना है। लेकिन जब एक ग्रामीण को अपनी समस्या के लिए यह सोचने में ही समय लग जाए कि साहब सुल्तानपुर में मिलेंगे या अमेठी में?, तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह मामला महज नक्शे पर खिंची सीमा का नहीं, बल्कि जवाबदेही की स्पष्टता का है। ग्रामीणों का कहना है कि उनका गांव जहां है, उनकी रोजमर्रा की प्रशासनिक जरूरतें जहां पूरी होती हैं, राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी उसी व्यवस्था से बेहतर तरीके से जुड़ना चाहिए। अब सवाल सीधा है कि 29 ग्राम पंचायतों के लोग आखिर किसके हिस्से की जनता हैं? गांव एक, समस्या एक और जनता भी एक है, तो फिर समाधान के लिए इतने दरवाजे क्यों। हलियापुर क्षेत्र के ग्रामीण अब शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से यही जवाब मांग रहे हैं कि वर्षों पुरानी इस सीमा-उलझन का समाधान कब होगा और कब उन्हें यह तय करने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि अपनी समस्या लेकर किस दरवाजे पर दस्तक दें?
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